यूपी की पूर्व IAS दिव्या मित्तल राजनीति में उतरेंगी। उन्होंने मंगलवार सुबह 8.30 बजे फेसबुक पर वीडियो जारी करके इसका खुलासा किया। उन्होंने कहा- यूपी में ही रहूंगी। डरूंगी नहीं, सवाल करूंगी। मुझे पैसा और बाहुबल नहीं चाहिए। सिर्फ आप लोगों का साथ चाहिए।
उन्होंने कहा-मैं किसी पार्टी के साथ नहीं जुड़ूंगी। अकेले चलूंगी। मेरा मकसद राजनेता बदलना नहीं, बल्कि पूरी राजनीति को बदलना है। हमारी राजनीति में सत्ता है, शिलान्यास है, शोर है, लेकिन सोच नहीं है। मुझे अपने देश की आजादी के 80 सालों का हिसाब चाहिए।
राजनीति में एंट्री का ऐलान कर दिव्या ने क्या कहा? हू-ब-हू पढ़िए
मैंने कुछ दिन पहले IAS से त्यागपत्र दिया और आपके मन में कई सवाल छोड़ दिए। कुछ दिनों तक जवाब नहीं दिया, क्योंकि काम बड़ा था और मैं हौसला जुटा रही थी, लेकिन आज सवालों के जवाब देने आई हूं। लोगों ने मुझे पूछा, सब कुछ तो बन गईं, अब और क्या बनना है?
मेरा जवाब है- राजनीति करूंगी। मुझे उन लोगों की आवाज बनना है, जिनकी आवाज किसी दफ्तर तक नहीं पहुंच पाती और अगर पहुंच भी जाए तो सुनी नहीं जाती। एक बार मैं लहुरियादह की पहाड़ी पर पानी पहुंचाने के लिए निरीक्षण कर रही थी, तभी एक महिला आई। मुझे लगा, उसे कुछ चाहिए होगा। शायद पेंशन या पक्का मकान।
उसने मुझसे कहा- ‘मैडम, आपसे कुछ मांगना है।’ उसने जो मांगा, उससे मेरा सिर शर्म से झुक गया। उसने कहा- ‘मैडम, हमारे गांव में स्कूल केवल 5वीं कक्षा तक है। उसके बाद जंगल और पहाड़ के बीच में बच्चों की पढ़ाई का अंत हो जाता है। मुझे आगे की कक्षा तक अपने गांव में स्कूल चाहिए।’
उस वक्त तक उस महिला के घर में पानी नहीं था। उसने स्कूल मांगा। मैंने नियम देखे, स्कूल मंजूर किया। आज 3 साल हो जाने के बाद वह स्कूल बनना शुरू नहीं हुआ। अब मुझे बताइए कि क्या नहीं था? पैसा नहीं था, नियम नहीं था, स्वीकृति नहीं थी? बस इरादा नहीं था। अगर इरादा होता तो पहाड़ भी रास्ता दे देता। इरादा नहीं था तो एक फाइल ही पहाड़ बन गई। मुझे उन गायब स्कूलों का हिसाब चाहिए।
जब मैं विशेष सचिव राजस्व थी, एक आदमी पन्नी में कागज लपेटे हुए आया। उसने कहा- ‘मैडम, मैं भूमिहीन था। कुछ साल पहले SDM ने सरकारी जमीन का मुझे पट्टे पर दे दिया। कागज तो मिल गए, लेकिन जमीन पर कब्जा नहीं मिला।’
मैंने उसके कागज देखे, रिपोर्ट सरासर झूठी थी। मैंने संबंधित जिले के अधिकारी से बात की। उसने माना कि रिपोर्ट गलत है। रिपोर्ट वापस हुई, बनाने वाले पर कार्रवाई हुई। इसके बाद उसे कब्जा दिलाना था। मैंने दो बार फोन किया, तीन बार कहलवाया तो वहां से जवाब आया कि ऊपर से मना किया गया है। यह ऊपर कौन है? संविधान तो कहता है कि सबसे ऊपर लोग हैं। तो उसे न्याय के लिए इधर-उधर क्यों भटकना पड़ रहा है? मुझे उन पन्नियों में लिपटे अन्याय का हिसाब चाहिए।
हजारों गांव हैं, जहां आज भी सड़क नहीं है। नदी है तो पुल नहीं है। बरसात में गांव टापू बन जाता है। पीढ़ियों से इंतजार चल रहा है। अगर सड़क है तो गड्ढे हैं। इन सड़कों पर नन्हे पांव पर चलकर स्कूल जाते हैं। लेकिन कीचड़ के दाग सफेद कपड़ों तक नहीं पहुंच पाते।
उसी गड्ढे में कोई मोटरसाइकिल वाला गिरता है, तो उसके खून के छींटे भी उनके कपड़ों तक नहीं पहुंच पाते। उनको जानकारी नहीं है, ऐसा नहीं है। उनको पता है कि गड्ढा कहां है, फाइल का नंबर क्या है और मौतों का आंकड़ा क्या है। नहीं है तो फिक्र। जब फिक्र नहीं होती तो मौत हादसा नहीं, फैसला होती है। मुझे उन मौतों का हिसाब चाहिए।
मैं साधारण परिवार की लड़की थी। इस देश ने मुझसे वादा किया था कि ‘पढ़ेगी तो बढ़ेगी’। मैंने पढ़ा और आज मैं आपके आगे खड़ी हूं। लेकिन आज के बच्चों का वादा क्या? जो रात-रात भर पढ़ रहे हैं। पेपर लीक हो जाता है। 5 साल तक तैयारी करो और फैसला किसी कोर्ट में। जो किसान जमीन गिरवी रखकर बेटे को इंजीनियर बना रहा है, या जो मां जेवर बेचकर बेटी को कोडिंग करा रही है, क्या उनको पता है कि उनका भविष्य सुरक्षित है कि नहीं?
आज के समय में बहुत सारे काम एआई करेगा। हर नौजवान को इस बात का डर है। मैं दो बेटियों की मां हूं, छोटी हैं, लेकिन मुझे अभी भी इसकी चिंता है। उनके पास जवाब नहीं है, कोई बात नहीं, किसी के पास नहीं है। लेकिन सवाल तो हो सकता था? सोच तो हो सकती थी? कोई सदन नहीं है, जहां पर इसके बारे में बात हो रही हो। हमारे बच्चे जिस भविष्य की ओर चल रहे हैं, उसकी किसी को चिंता ही नहीं है।
मुझे वो राजनीति नहीं करनी है, जो लोगों को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंच जाए। वो राजनीति करनी है, जो लोगों को सुनती है और वहीं पर रुक जाती है, क्योंकि लोग ही तो मंजिल हैं। यहीं पर दूसरे सवाल का जवाब आता है। जब मंजिल आप हैं, तो मंजिल तक पहुंचने वाला रास्ता भी सिर्फ आप ही से होकर गुजरेगा, किसी झंडे (पार्टी) के नीचे नहीं।
जिन झंडों के नीचे 80 सालों में हिसाब नहीं बदला, उन झंडों के नीचे खड़े होकर हिसाब नहीं मांगा जा सकता। इसलिए मैं राजनीति करूंगी, किसी दल के साथ नहीं। सिर्फ आपके साथ। लेकिन ये कैसे होगा? राजनीति तो शरीफ लोगों के लिए है ही नहीं। इसका जवाब मुझे अपने इस्तीफे के चंद घंटों में मिल गया, जहां आम लोगों ने मेरा समर्थन किया।
एक बड़ी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता ने लिखा कि मैं रात के अंधेरे में एक दूसरी बड़ी पार्टी के बड़े नेता से मिली थी। वो मुलाकात कभी नहीं हुई थी। ये बात लिखने वाले को भी पता थी, लेकिन मकसद सच लिखना नहीं था। मकसद था- एक महिला जो सवाल पूछने निकली है, उसको पहले ही दिन डरा दो।
यही तो ये लोग करते हैं। किसी को FIR करके डरा दो, किसी को ट्रोल करके बिठा दो, ताकि अच्छे लोग राजनीति में न आएं। इनकी ऐसे ही राजनीति चलती रहे। हमें इसको बदलना है। मैं डरूंगी नहीं, मैं सवाल ही पूछूंगी, ताकि देश की हर छोटी बच्ची अपने मन की बात कह सके और उसे रात के अंधेरे का डर न दिखाया जा सके।
जिन लोगों ने उस दिन मेरा समर्थन किया था, उन्हीं लोगों के साथ एक ऐसा मंच बनाएंगे, जो इनसे डरेगा नहीं। ये बताइए, जो पैसा चुनाव में बहाया जाता है, वो कहां से आता है? वो हमारी सड़क से आता है, हमारे पुल से आता है, हमारे स्कूल से आता है। मुझे वो पैसा नहीं बहाना, मुझे वो सड़क ही चाहिए।
ये बाहुबल जनता पर दिखाया जाता है, मुझे वो नहीं चाहिए। मुझे लोगों से बनी हुई शक्ति चाहिए, जो लोगों के लिए हो और लोगों की ही हो। जाति-धर्म का समीकरण इसलिए नहीं है, क्योंकि मैंने कभी बैठाया नहीं। जब मैं अधिकारी थी तो न्याय करने से पहले मैंने कभी किसी का नाम नहीं पूछा, राजनीति में भी नहीं पूछूंगी। 80 सालों तक इन्होंने समीकरण ही तो बैठाए और साथ में देश भी बैठा रह गया। इस तरह की राजनीति कैसे शुरू होगी, कैसे खड़ी होगी और कैसे चलेगी, ये हम लोग साथ मिलकर तय करेंगे।
अब तीसरा सवाल- मैं कहां से आई थी। तो जवाब है कि मैं अफसर बनकर आई थी, लेकिन यहां के लोगों ने मुझे बेटी बना लिया। सिर पर हाथ रखा, घर का खाना खिलाया, जब थकी तो संभाला। गुरु वो होता है, जो हमें हमसे मिलवा दे। यहां की मिट्टी ने मुझे सिखाया कि मैं कौन हूं, किसके लिए हूं।
यूपी की मिट्टी ही मेरी कर्मभूमि है। इसीलिए शुरुआत यहीं से ही करूंगी। हमें बताया गया है कि इस देश में कुछ नहीं बदलता और खास तौर पर यूपी में। लेकिन, मैं उस देश को जानती हूं, जिसे कहा गया था- आजादी के बाद टुकड़ों में बंट जाएगा, लेकिन मेरा देश आज भी खड़ा है।
यूपी ने तो हमेशा राह दिखाई है। आजादी की चिंगारी सबसे पहली बार उत्तर प्रदेश से ही शुरू हुई। आज भी जनपद-दर-जनपद मैंने देखा कि लोग सही के साथ जुड़ते हैं। जो काम अफसर भी नहीं कर पाते, वो लोग करके दिखाते हैं। देवरिया में ‘ऑपरेशन कब्जा मुक्ति’ के दौरान लोगों ने खुद सरकारी जमीनों से अपने कब्जे छोड़े।
हम 80 सालों से किसी नेता, किसी मसीहा का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कोई नहीं आया। क्योंकि जिसका हमें इंतजार था, वो हम खुद हैं। इसलिए मैं आपको कह रही हूं कि मुझ पर भरोसा मत करिए, अपने आप पर करिए। मैं शिक्षक, डॉक्टर, किसान, मजदूर, वकील, छात्र और उस मां को बुला रही हूं, जिनको अपने बच्चे के सुनहरे कल की चिंता है।
नई राजनीति कोई एक आदमी नहीं बना सकता, उसमें तो सबका साथ लगेगा। एक दिन ऐसा आएगा, जब कोई आदमी अपने कागज एक पन्नी में लपेटे किसी सरकारी दफ्तर जाएगा, तो बिना किसी सिफारिश और बिना किसी फोन के उसकी सुनवाई होगी। और घर आकर वो अपने बेटे से कहेगा कि बेटे, आज मेरे साथ न्याय हुआ। और बेटा कहेगा, तो पापा इसमें नया क्या है? तो उसे याद होगा कि उसके पन्नी का हिसाब किस दिन मांगा गया था। चलिए हिसाब मांगते हैं…
इस्तीफा मंजूर होने पर लिखा था- बढ़े चलो बढ़े चलो
इस्तीफा मंजूर होने पर दिव्या मित्तल ने लिखा था- मेरा IAS से त्यागपत्र स्वीकार हो गया है। साथ ही कवि जयशंकर प्रसाद के नाटक चंद्रगुप्त की लाइनें भी ल प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।”
प्रशस्त पुण्य पंथ है- इसका अर्थ है कि मातृभूमि की रक्षा और स्वतंत्रता का यह मार्ग बहुत ही विशाल, साफ और पवित्र (पुण्यदायी) है। बढ़े चलो, बढ़े चलो- कवि देश के साहसी सपूतों और सैनिकों का आह्वान करते हैं कि वे बिना रुके, बिना डरे इस पावन मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहें।
लंदन में नौकरी छोड़कर सिविल सर्विस में आई थीं दिव्या
दिव्या मूलरूप से हरियाणा के रेवाड़ी की रहने वाली हैं। IIT-IIM से पढ़ाई के बाद लंदन में नौकरी की। यहीं गगनदीप सिंह से उनकी मुलाकात हुई। दोनों ने लव-मैरिज की। हालांकि, कुछ सालों बाद पति-पत्नी लंदन की नौकरी छोड़ भारत लौट आए।
दिव्या UPSC की तैयारी में जुट गईं। उन्होंने बिना कोचिंग पहले प्रयास में IPS क्लियर किया। उन्हें गुजरात कैडर मिला। IPS की ट्रेनिंग के दौरान भी दिव्या ने IAS की तैयारी जारी रखी। अगले ही साल 2013 में उनका IAS में सिलेक्शन हो गया।
दिव्या के पति पंजाब के रहने वाले, पहले प्रयास में UPSC पास किया था
दिव्या के पति गगनदीप सिंह का परिवार पंजाब के बठिंडा जिले के गिद्दड़बाहा का रहने वाला है। उन्होंने 1998 से 2002 तक IIT दिल्ली से केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। इसके बाद 2003 से 2005 तक IIM बैंगलोर से मैनेजमेंट की पढ़ाई की।
गगनदीप ने 2010 में पहले ही प्रयास में UPSC पास किया था। उन्हें इंडियन ट्रेड सर्विस मिली थी। चार साल पहले, 2022 में उन्होंने वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में संयुक्त महानिदेशक के पद से इस्तीफा दिया था।