हाईकोर्ट ने कहा- बेटे और दामाद में कोई अंतर नहीं:बेटे को माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए जमानत मिलती है तो दामाद को क्यों नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने दामाद को उसकी सास के अंतिम संस्कार की क्रियाओं में शामिल होने के लिए 10 दिन की अंतरिम जमानत दी है। जस्टिस अनूप कुमार ढंढ की कोर्ट ने 30 मार्च को सुनवाई की थी।

कोर्ट ने कहा- जब न्यायालय अपने दिवंगत माता-पिता के अंतिम संस्कार और रीति-रिवाजों को पूरा करने के लिए बेटों द्वारा दायर अंतरिम जमानत याचिकाओं को स्वीकार करने में उदारता दिखाता है, तो निश्चित रूप से दामाद को भी वही अधिकार मिलने चाहिए। याचिकाकर्ता अपने ससुराल में रह रहा था।

कोर्ट ने आगे कहा- आज समाज बदल गया है। बेटे और दामाद के बीच कोई अंतर नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट ने सेन्ट्रल जेल कोटा के अधीक्षक को निर्देश दिया कि वह आरोपी को 10 दिन के लिए रिहा करे। साथ ही, आरोपी को जमानत अवधि पूरी होने के तुरंत बाद अधीक्षक के सामने पेश होने का भी आदेश दिया।

बेटी ने किया था अंतिम संस्कार

वकील सुरेन्द्र कुमार लांबा ने कोर्ट को बताया- याचिकाकर्ता गिर्राज को कोटा के बोरखेड़ा थाना पुलिस ने हत्या के आरोप में साल 2024 में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी से पहले आरोपी अपनी पत्नी और सास के साथ ही रह रहा था। गिर्राज की सास का निधन 1 मार्च को हो गया था।

उनका अंतिम संस्कार 2 मार्च को गिर्राज की पत्नी ने किया, लेकिन परिवार में एकमात्र पुरुष होने के कारण अन्य क्रियाएं नहीं हो सकीं। इन अंतिम क्रियाओं को पूरा करने के लिए अंतरिम जमानत दी जाए। इसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए जमानत मंजूर की।

पुलिस से मांगी तथ्यात्मक रिपोर्ट

जमानत याचिका दायर होने के बाद कोर्ट ने संबंधित थानाधिकारी को मामले में तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। एसएचओ बोरखेड़ा ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया कि हत्या का मामला दर्ज होने से पहले तक आरोपी अपनी सास के घर पर ही रह रहा था।

उसकी सास के कोई बेटा नहीं है। कोर्ट ने अंतरिम जमानत मंजूर करते हुए एसएचओ की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेने के निर्देश दिए हैं।