मैं मस्जिद में इमामत कराने गया था, लेकिन वहां पहुंचते ही मुझे 40 कमरों वाले मिनिस्ट्री ऑफिस की सफाई में लगा दिया गया। रोज टॉयलेट साफ करता था। बर्तन धोता था। 14-15 घंटे काम करता था। कई-कई दिन भूखा रहता था। ऐसा लगता था कि मर जाऊं… सुसाइड कर लूं।
यह दर्द रायसेन जिले के दीवानगंज निवासी मोहम्मद फैजान का है। बेहतर भविष्य और धार्मिक सेवा का सपना लेकर वह ओमान गए थे, लेकिन वहां उनकी जिंदगी कैद जैसी हो गई। उन्हें न सम्मान मिला, न वेतन और न ही दो वक्त की रोटी की गारंटी।
करीब ढाई महीने तक मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलने के बाद भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन की पहल पर भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय के हस्तक्षेप से उनकी सुरक्षित वतन वापसी हुई।
जनवरी में मिला एजेंट, बोला- मस्जिद में इमामत कराओगे
दैनिक भास्कर से फैजान ने बताया कि जनवरी 2026 में उनकी मुलाकात एक एजेंट से हुई। उसने भरोसा दिलाया कि ओमान की एक मस्जिद में उन्हें इमामत (नमाज पढ़ाने) का काम मिलेगा। पहले 20 हजार रुपए लिए गए।
इसके बाद मेडिकल प्रक्रिया के दौरान 1 लाख 80 हजार रुपए और जमा कराए गए। परिवार ने करीब 2 लाख रुपए का इंतजाम कर उन्हें विदेश भेजा। 4 मई 2026 को वह ओमान के मस्कट पहुंचे।
2-3 दिन कंपनी में रखा, फिर 40 कमरों की सफाई में लगा दिया
फैजान ने बताया कि मस्कट पहुंचने के बाद कंपनी ने उन्हें दो-तीन दिन अपने पास रखा। इसके बाद एक मिनिस्ट्री ऑफिस भेज दिया, लेकिन जिस काम के लिए गए थे, वह कभी नहीं मिला।
उन्हें 30 से 40 कमरों वाले मिनिस्ट्री ऑफिस की सफाई कराई जाती थी। सभी कमरों, टॉयलेट, बाथरूम, बर्तनों और अन्य सफाई का काम उनसे कराया जाता था।
14-15 घंटे की ड्यूटी, लेकिन खाने तक के पैसे नहीं
फैजान के मुताबिक, उनसे रोज 14 से 15 घंटे काम कराया जाता था। इसके बावजूद कंपनी ने न वेतन दिया और न खाने के लिए पैसे। पैसे मांगने पर हर बार कहा जाता था- “अभी नहीं हैं, बाद में देंगे।” धीरे-धीरे उनकी जेब खाली हो गई। कई बार लगातार चार-चार दिन तक भूखे रहने की नौबत आ गई।
भूख से परेशान फैजान की मदद कंपनी ने नहीं, बल्कि वहां रहने वाले भारतीयों ने की। मस्कट निवासी नवाब भाई ने खाने के लिए पैसे दिए, जबकि मोहम्मद खलील अहमद उन्हें अपने घर ले गए। मोहम्मद खलील अहमद ने उन्हें करीब डेढ़ महीने तक अपने पास रखा।
एजेंट ने मदद करने के बजाय नंबर ब्लॉक कर दिया
फैजान के अनुसार, मई के आखिर और जून की शुरुआत तक उन्होंने कई बार एजेंट से संपर्क किया। एजेंट हर बार “एक-दो दिन इंतजार करो” कहकर टालता रहा। बाद में उसने नंबर ही ब्लॉक कर दिया। जब कंपनी से भारत लौटने की बात कही तो 650 रियाल (16,629 रुपए) जमा कराने की शर्त रख दी गई।
आबिद हुसैन तक पहुंचा मामला, उसी दिन दूतावास हरकत में आया
18 जुलाई को फैजान का मामला भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन तक पहुंचा। उन्होंने उसी दिन भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय के अधीन भारतीय प्रवासी सहायता केंद्र को शिकायत भेजी। दूतावास ने फैजान को बुलाकर दस्तावेजी प्रक्रिया शुरू कराई।
बाद में लेबर कोर्ट से एग्जिट परमिट मिला। 26 जुलाई को भारतीय दूतावास ने ई-मेल भेजकर पुष्टि की कि फैजान की वापसी की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। 28 जुलाई की रात वह मुंबई पहुंचे और 30 जुलाई की रात अपने घर दीवानगंज लौट आए।
आबिद हुसैन के मुताबिक, कंपनी ने फैजान का पासपोर्ट भी अपने कब्जे में रख लिया था। दूतावास के हस्तक्षेप के बाद दस्तावेज वापस मिले। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर उनकी घर वापसी संभव हो सकी
1500 से ज्यादा भारतीयों की मदद कर चुके हैं आबिद हुसैन
भोपाल निवासी सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन कई वर्षों से विदेशों में फंसे भारतीयों की मदद कर रहे हैं। उनके मुताबिक, अब तक वे करीब 1500 भारतीयों की सुरक्षित वतन वापसी में सहयोग कर चुके हैं।
फैजान के मामले में भी उन्होंने भारतीय दूतावास, विदेश मंत्रालय और भारतीय प्रवासी सहायता केंद्र से समन्वय कर प्रक्रिया तेज कराई। उनका कहना है कि सही समय पर शिकायत और दस्तावेज उपलब्ध होने पर अधिकांश मामलों में भारतीय दूतावास प्रभावी कार्रवाई करता है।