नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह सोमवार को सबसे पहले भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात करेंगे। इसके बाद वे चीन के राजदूत झांग माओमिंग से बातचीत करेंगे। मंगलवार को शाह अमेरिकी दूतावास के प्रभारी अधिकारी स्कॉट अर्बोम से वन-टू-वन बैठक करेंगे।
काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहली बार होगा, जब शाह किसी विदेशी राजदूत से अकेले में मिलेंगे। इससे पहले वे विदेशी राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते रहे थे।
इन बैठकों में नेपाल के भारत, चीन और अमेरिका के साथ रिश्तों और मौजूदा मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
दो हफ्ते पहले होनी थी मुलाकात, हिंसा के बाद टली
शाह की इन राजनयिकों से मुलाकात करीब दो हफ्ते पहले तय थी, लेकिन सुनसरी और दूसरे जिलों में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद इसे टाल दिया गया था।
अब सरकार ने दोबारा बैठकें तय की हैं। प्रधानमंत्री के एक सलाहकार के मुताबिक, संबंधित दूतावासों को मुलाकात का समय बता दिया गया है।
पहले विदेशी अधिकारियों से अकेले नहीं मिलते थे शाह
प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में शाह ने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों से वन-टू-वन मुलाकात नहीं करने की नीति अपनाई थी।
इसी वजह से भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की 11-12 मई की नेपाल यात्रा भी विवादों के बीच टल गई थी। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक, शाह का मिस्री से अकेले में मिलने से इनकार भी इसकी वजहों में शामिल था।
शाह ने अमेरिकी अधिकारियों समीर पॉल कपूर और सर्जियो गोर से मुलाकात के अनुरोध भी स्वीकार नहीं किए थे। अमेरिकी विदेश विभाग की अंडर सेक्रेटरी सारा बी. रोजर्स भी नेपाल दौरे पर आई थीं, लेकिन उनकी शाह से मुलाकात नहीं हो सकी थी।
इसके बजाय शाह ने 9 अप्रैल और 26 मई को काठमांडू में तैनात कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं।
अब क्यों बदल रही है शाह की नीति?
शाह की सामूहिक बैठकों की नीति को नेपाल के कई राजनयिकों और विदेश नीति के जानकारों ने संतुलित कदम बताया था। उनका मानना था कि इससे किसी एक देश को ज्यादा तवज्जो देने का संदेश नहीं जाता और सभी देशों के साथ बराबरी का व्यवहार दिखता है।
लेकिन सरकार के 100 दिन पूरे होने के बाद शाह के सलाहकारों ने उन्हें घरेलू और विदेशी स्तर पर अलग-अलग लोगों से मिलने की सलाह दी। इसके बाद शाह ने मधेश के राजनीतिक दलों और सांसदों के साथ-साथ कारोबारियों, उद्योगपतियों, ठेकेदारों और निर्यातकों से भी अलग-अलग मुलाकातें शुरू कीं।
अब विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन बातचीत भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है