राजस्थान के करौली में प्रसिद्ध ‘श्री महावीर जी जैन मंदिर’ के प्रबंधन और संचालन को लेकर जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर पक्षों के बीच चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखते हुए दोनों पक्षों को 8 दिन में लिखित बहस दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
सुनवाई के दौरान धार्मिक संवेदनशीलता का जिक्र करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से इस मुद्दे को बेहद सावधानी से निपटाने की बात कही। उन्होंने दोनों पक्षों से मुकदमेबाजी समाप्त करने की अपील करते हुए कहा-
यह बहुत ही नाजुक और धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है। किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना, क्या आप यह उम्मीद करते हैं कि सुबह श्वेतांबर अपने तरीके से अनुष्ठान करेंगे और शाम को दिगंबर भगवान के वस्त्र बदलकर अपने तरीके से पूजा-अर्चना करेंगे? आप महान भगवान को परेशान क्यों कर रहे हैं? इस धरती पर अवतरित सबसे महान संतों में से एक के नाम पर यह अनावश्यक मुकदमेबाजी क्यों? क्या आपको लगता है कि इस सबसे वे खुश होंगे?
क्या हैं दोनों पक्षों की दलीलें?
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तर्क दिया कि इस मामले में पूजा स्थल के परिवर्तन की कोई मांग नहीं की गई है, इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 इस मामले में लागू नहीं होता है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल संपूर्ण जैन समुदाय के हित में मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम (याचिकाकर्ता- दिगंबर समिति) ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट को अपील पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी। चूंकि 1991 के एक्ट में अपील का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए दूसरे पक्ष को रिट याचिका दाखिल करनी चाहिए थी। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक स्थापित तथ्य है कि मूर्ति (देवता), मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण, कब्जा और प्रबंधन दिगंबर जैन संप्रदाय के पास ही रहा है।
जानिए- पूरा कानूनी विवाद?
यह मामला राजस्थान सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम, 1959 की धारा 40 के तहत दायर एक आवेदन से शुरू हुआ था। इसमें मंदिर का प्रबंधन संभाल रही ‘दिगंबर समिति’ (प्रबंधकारिणी कमेटी दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्री महावीरजी) के अध्यक्ष और सचिव को हटाने तथा श्वेतांबर संप्रदाय की एक नई प्रबंधन समिति बनाने की मांग की गई थी।