एक का दायां हाथ बिजली के करंट में हमेशा के लिए चला गया। दूसरे की पीठ, कंधा और हाथ इस तरह झुलस गए कि महीनों अस्पताल में रहना पड़ा। किसी ने डेढ़ लाख रुपए इलाज पर खर्च किए, किसी के इलाज में आठ-दस लाख रुपए तक लग गए।
इनमें से ज्यादातर पैसा विभाग ने नहीं, बल्कि साथियों के चंदे और परिवार के कर्ज से जुटाया गया। यह कहानी किसी एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के बिजली विभाग में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों की है, जो हर दिन मौत के साए में काम करते हैं।
शनिवार को भोपाल के अंबेडकर मैदान में हुए धरना-प्रदर्शन में ऐसे कई कर्मचारी पहली बार अपने जख्म और दर्द लेकर सामने आए।
गलत परमिट मिला… खंभे पर चढ़ा तो लाइन चालू थी
अनूपपुर ग्रामीण में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारी धर्मेंद्र कुमार पटेल आज भी उस दिन को भूल नहीं पाए हैं। उन्होंने बताया कि 7 जून 2024 को ड्यूटी के दौरान उन्हें बताया गया कि लाइन का परमिट मिल चुका है।
भरोसा कर वे खंभे पर चढ़ गए, लेकिन लाइन बंद नहीं थी। जैसे ही तार को छुआ, तेज करंट ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। वे करीब 25 फीट ऊंचाई से नीचे गिर पड़े। हादसे में उनका एक हाथ काटना पड़ा और पेट पर भी गंभीर चोटें आईं।
धर्मेंद्र बताते हैं कि इलाज में करीब आठ से दस लाख रुपए खर्च हुए। कंपनी से सिर्फ एक लाख रुपए मिले, कुछ सहयोग अधिकारियों ने किया, जबकि बाकी रकम साथियों के चंदे और परिवार ने जुटाई। आज भी उन्हें करीब 12,500 रुपए वेतन मिलता है।
उनकी दो साल की बेटी हादसे के समय महज एक महीने की थी। वह कहते हैं, “पहले मैं विभाग के लिए अच्छा कर्मचारी था, लेकिन हादसे के बाद किसी ने यह नहीं पूछा कि गलती किसकी थी। आज भी उतना ही काम कराया जाता है, लेकिन जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
इसी मामले में आउटसोर्स कर्मचारी दिनेश सिसोदिया का कहना है कि परमिट जारी करने की पूरी प्रक्रिया तय नियमों के तहत होती है। उनके मुताबिक, अनुभवी और अधिकृत अधिकारी ही लाइन बंद कर कोड के आदान-प्रदान के बाद परमिट जारी करता है।
यदि इस प्रक्रिया में लापरवाही हो या गलत फीडर का परमिट जारी कर दिया जाए, तो कर्मचारी यह मानकर लाइन पर चढ़ जाता है कि बिजली बंद है, जबकि वास्तव में लाइन चालू रहती है। उनका दावा है कि कई गंभीर हादसों की एक बड़ी वजह यही लापरवाही होती है।
पूरी पीठ जल गई… इलाज साथियों ने कराया
रायसेन के रहने वाले विनोद कुमार रैकवार के शरीर पर आज भी उस हादसे के निशान मौजूद हैं। डीटीआर पर काम करते समय करंट लगने से उनकी पीठ, कंधा और हाथ बुरी तरह झुलस गए। करीब 15 से 20 दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इलाज में लगभग डेढ़ लाख रुपए खर्च हुए।
विनोद बताते हैं कि इलाज का खर्च विभाग ने नहीं उठाया। लाइन के साथियों ने चंदा किया, तभी इलाज हो पाया। विभाग से कई बार कहा, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिलता रहा। वे कहते हैं कि हर महीने मिलने वाली करीब 10 हजार रुपए की तनख्वाह से घर चलाना मुश्किल है।
दो बच्चों की पढ़ाई, परिवार का खर्च और इलाज का कर्ज… सब कुछ उधार लेकर चलाना पड़ता है। “अगली तनख्वाह आने से पहले पिछली पूरी खत्म हो जाती है। कई बार बच्चों की फीस भरने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है।
18 साल नौकरी, हादसे के बाद भी इलाज के लिए चंदा
आउटसोर्स कर्मचारी लक्ष्मण प्रसाद अहिरवार करीब 18 साल से बिजली विभाग में काम कर रहे हैं। चार-पांच साल पहले करंट लगने से वे गंभीर रूप से झुलस गए थे। इलाज में करीब दो से ढाई लाख रुपए खर्च हुए। उनका कहना है कि इलाज के लिए साथियों ने चंदा किया, विभाग से बहुत सीमित मदद मिली। आज भी वे उसी नौकरी में हैं और कहते हैं, “क्या करें… मजबूरी है।”
बिना प्रशिक्षण और गलत परमिट हादसों की बड़ी वजह
आउटसोर्स कर्मचारी दिनेश सिसोदिया का कहना है कि बिजली विभाग में होने वाले अधिकांश हादसों की वजह बिना प्रशिक्षण कर्मचारियों से काम कराना और परमिट प्रक्रिया में लापरवाही है। उनके मुताबिक, कई बार अनुभवहीन कर्मचारियों को सीधे जोखिम वाले काम पर भेज दिया जाता है।
उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में लगभग हर सप्ताह दो से तीन आउटसोर्स कर्मचारियों की बिजली हादसों में मौत होने की खबरें सामने आती हैं। उनका कहना है कि यदि सुरक्षा मानकों और परमिट की प्रक्रिया का सख्ती से पालन हो तो ऐसे कई हादसे टाले जा सकते हैं।
धरना में उठी मांग- हादसे के बाद कर्मचारी अकेला क्यों?
धरना-प्रदर्शन में शामिल कर्मचारियों ने कहा कि वे रोजाना हजारों घरों तक बिजली पहुंचाने के लिए जान जोखिम में डालते हैं, लेकिन हादसा होने पर उनका सहारा विभाग नहीं, बल्कि साथी कर्मचारी और परिवार बनते हैं। कर्मचारियों ने सरकार से मांग की कि आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए स्थायी सेवा सुरक्षा नीति बनाई जाए, गंभीर दुर्घटनाओं में पूरा इलाज और पर्याप्त मुआवजा दिया जाए तथा जिम्मेदारी तय कर सुरक्षा व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए।