जनजातीय कार्य विभाग के मंत्री विजय शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए विवादित बयान के मामले में सरकार आज कैबिनेट बैठक में अभियोजन स्वीकृति देने पर फैसला करेगी। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर इसे राज्यपाल के पास भेजा जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में होनी है। इससे पहले सरकार को अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय लेना है।
मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति का मामला करीब एक साल से लंबित है। मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(a) के तहत उनके खिलाफ अभियोजन चलाने की अनुमति मांगी है। सरकारी सेवक के खिलाफ अभियोजन की अनुमति से जुड़े प्रावधान के तहत सरकार की मंजूरी जरूरी बताई गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को इस मामले में निर्णय लेने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। इसके बावजूद फैसला लंबित रहा। अब सरकार कैबिनेट के जरिए इस पर निर्णय लेने की तैयारी में है।
मंजूरी मिली तो राज्यपाल के पास जाएगा प्रस्ताव
यदि कैबिनेट अभियोजन स्वीकृति के प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो इसे राज्यपाल के पास भेजा जाएगा। राज्यपाल की मंजूरी के बाद गृह विभाग सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में शपथपत्र पेश करेगा।
मंजूरी नहीं मिली तो भी खत्म नहीं होगा मामला
सरकार से अभियोजन की अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में भी मामला खत्म नहीं होगा। ऐसी स्थिति में केस लंबित रह सकता है। विजय शाह के मंत्री पद से हटने के बाद एसआईटी उनके खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई आगे बढ़ा सकती है। उस समय सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं होगी।
BNS की धारा 196(1)(a) में तीन साल तक की सजा
एसआईटी ने विजय शाह के खिलाफ BNS की धारा 196(1)(a) के तहत अभियोजन की अनुमति मांगी है। इस धारा में विभिन्न नस्लीय, धार्मिक, क्षेत्रीय और जातीय समूहों के बीच नफरत या असमानता फैलाने जैसे कृत्यों के लिए तीन साल तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान बताया गया है।
अब कैबिनेट के फैसले पर सभी की नजर है, क्योंकि 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई होनी है।
मंत्री शाह ने दिया था विवादित बयान
भारतीय सेना में कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर मंत्री विजय शाह ने इंदौर के महू के रायकुंडा गांव में आयोजित हलमा कार्यक्रम के दौरान 11 मई 2025 को आपत्तिजनक बयान दिया था। ऑपरेशन सिंदूर को लेकर शाह ने कहा था- ‘उन्होंने (आतंकियों ने) कपड़े उतार-उतार कर हमारे हिंदुओं को मारा और मोदी जी ने उनकी बहन को उनकी ऐसी की तैसी करने उनके घर भेजा।’
शाह ने आगे कहा- ‘अब मोदी जी कपड़े तो उतार नहीं सकते। इसलिए उनकी समाज की बहन को भेजा कि तुमने हमारी बहनों को विधवा किया है, तो तुम्हारे समाज की बहन आकर तुम्हें नंगा करके छोड़ेगी। देश का मान-सम्मान और हमारी बहनों के सुहाग का बदला तुम्हारी जाति, समाज की बहनों को पाकिस्तान भेजकर ले सकते हैं।’ मामले में विजय शाह कई बार माफी मांग चुके हैं।
जनवरी में सरकार को मिले थे दो सप्ताह, मई में फिर चार सप्ताह
19 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था कि एसआईटी अपनी जांच पूरी कर अंतिम रिपोर्ट दे चुकी है, लेकिन BNS की धारा 196 के तहत आगे की कार्रवाई के लिए जरूरी अभियोजन स्वीकृति का मामला राज्य सरकार के पास लंबित है। तब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस पर उचित निर्णय लेने के लिए दो सप्ताह दिए थे।
मई 2026 में मामला दोबारा आया तो फैसला नहीं हुआ था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर सख्ती दिखाते हुए पुराने निर्देशों का पालन करने और चार सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट देने का आदेश दिया।
अब ऑफिस रिपोर्ट में खुलासा- एक भी अनुपालन दस्तावेज नहीं
इस मामले में सबसे नया और महत्वपूर्ण तथ्य सुप्रीम कोर्ट की 23 जुलाई की ऑफिस रिपोर्ट में सामने आया है। इसमें साफ लिखा है कि 8 मई 2026 के आदेश के अनुपालन में अब तक कोई दस्तावेज दाखिल नहीं किया गया है। यानी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चार सप्ताह दिए थे, लेकिन करीब ढाई महीने बाद भी कोर्ट के रिकॉर्ड में अनुपालन दस्तावेज नहीं पहुंचा था।
कोर्ट ने कहा था-माफी मांगने में देरी कर दी
19 जनवरी 2026 में सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि राज्य सरकार विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट पर कई महीनों से कोई फैसला नहीं ले रही है। जबकि विशेष जांच दल ने अपनी जांच पूरी कर ली है और अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी है।
बेंच ने यह भी कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट में कुछ अन्य मामलों का भी जिक्र है, जहां शाह ने कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी से इन मामलों में की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई पर भी रिपोर्ट पेश करने को कहा।
मंत्री विजय शाह की ओर से सीनियर वकील मनिंदर सिंह ने कोर्ट को सूचित किया कि उन्होंने (विजय शाह ने) अपना माफीनामा दर्ज करा दिया है। वे जांच में सहयोग कर रहे हैं। हालांकि, बेंच ने कहा कि ये कोई माफीनामा नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा-
माफी मांगने में बहुत देर हो चुकी है। हमने पहले ही इस बात पर टिप्पणी की थी कि किस तरह की माफी मांगी जा रही है।
इससे पहले, कोर्ट ने शाह की ओर से दी गई सार्वजनिक माफी को “कानूनी दायित्व से बचने के लिए महज मगरमच्छ के आंसू” बताकर खारिज कर दिया था। बाद की सुनवाई में, अदालत ने उनकी “ऑनलाइन माफी” पर असंतोष जताया।
राज्य को कानून के अनुसार कदम उठाने के निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमें बताया गया है कि मामला यहां लंबित होने के कारण राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। हम मध्य प्रदेश राज्य को निर्देश देते हैं कि वह कानून के अनुसार अभियोजन की मंजूरी के लिए उचित कदम उठाए।” इससे पहले राज्य सरकार ने दलील दी थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण उसने एसआईटी के अनुरोध पर कोई फैसला नहीं लिया।