अमेरिका के शिकागो में मंगलवार को 50 से अधिक भारतीय प्रवासी भारतीय वाणिज्य दूतावास के बाहर जुटे और भारत में मतदाता सूची से कथित तौर पर अवैध तरीके से नाम हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारियों ने ‘जय भीम’, ‘जय सावित्री’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नारे लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटने से लोगों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
प्रदर्शन का आयोजन शिकागो में रहने वाले भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्यों ने स्वतंत्र रूप से किया। इसे इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC), SACRED और हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) का समर्थन मिला।
प्रदर्शन में भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्यों, विद्यार्थियों, विभिन्न धर्मों के नेताओं और अन्य सहयोगियों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यक समुदायों पर अधिक पड़ सकता है। उन्होंने निर्वाचन आयोग से मांग की कि गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े जाएं और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को पारदर्शी व जवाबदेह बनाया जाए।
‘वोट हटाना जनता की आवाज पर हमला’
भारतीय मूल के नागेश फार्मर ने कहा कि वोट लोकतंत्र की बुनियाद है। जब नागरिकों के नाम चुपचाप मतदाता सूची से हटा दिए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि जनता की आवाज पर हमला है। उन्होंने मोदी सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रवासी भारतीय इस मुद्दे पर चुप नहीं रहेंगे।
जबलपुर निवासी विशाल कुमार और संदीप कांबले, जो समाजवादी स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य हैं और शिकागो में पढ़ाई कर रहे हैं, ने कहा कि हिंदू धर्म उन्हें न्याय और हर व्यक्ति की गरिमा के लिए खड़े होने की सीख देता है। उनके मुताबिक, मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों और गरीबों पर मतदान के अधिकार से वंचित होने का असमान प्रभाव पड़ने की आशंका संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा गंभीर सवाल है।
‘परिवार को वोट देने के लिए अस्तित्व साबित न करना पड़े’
शिकागो विश्वविद्यालय की स्नातक छात्रा सानविका ने कहा कि भारत में उनके परिवार को अपने ही देश में वोट डालने के लिए यह साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि उनका अस्तित्व है। उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र की चिंता हर उस व्यक्ति की चिंता है, चाहे वह दुनिया के किसी भी हिस्से में रहता हो।
महाराष्ट्र के नागपुर निवासी डॉ. ओबेद मनवतकर, जो शिकागो में अंतरधार्मिक अध्ययन के प्रोफेसर हैं, ने कहा कि उनकी नानी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में स्वतंत्रता के अधिकार के लिए ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा लगाया था।
आज वे उसी अधिकार की रक्षा के लिए यह नारा लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस व्यवस्था में सरकार तय करे कि किसे वोट देने का अधिकार मिलेगा, वह वास्तविक लोकतंत्र नहीं हो सकता।
‘भारत में लोकतंत्र को खोखला होते नहीं देख सकता’
शिकागो में पिछले 20 साल से रह रहे रविंद्र सिंह ने कहा कि उनका दिल आज भी भारत में बसता है और वे देश के लोकतंत्र को अंदर से कमजोर होते हुए चुपचाप नहीं देख सकते। उन्होंने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का गंभीर तरीका बताया और इसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत पर जोर दिया।
परिवार के साथ प्रदर्शन में पहुंची एक महिला ने कहा कि वह अपने बच्चों को इसलिए साथ लाई हैं, ताकि वे समझ सकें कि स्वतंत्रता ऐसी विरासत नहीं है, जिसकी रक्षा करने की जरूरत न हो। हर पीढ़ी को इसकी रक्षा करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ केवल नारा नहीं, बल्कि सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की मांग है।
अमेरिकी जनप्रतिनिधियों से भी हस्तक्षेप की अपील
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह आयोजन भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रवासी भारतीयों की ओर से किए जा रहे प्रयासों का हिस्सा है। उन्होंने अमेरिका के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और आम लोगों से भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने की अपील की। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और हर पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।