फेनॉफ्थलीन…एक केमिकल पाउडर। घूसखोरों को सलाखों के पीछे पहुंचाने वाला सबसे अचूक हथियार।
शिकायतकर्ता अपनी बात से मुकर जाए, गवाह पलट जाएं या किसी की मौत ही क्यों न हो जाए… फेनॉफ्थलीन की FSL रिपोर्ट का ऐसा शिकंजा कसता है कि रिश्वतखोर का जेल जाना तय हो जाता है।
इसकी तस्दीक नवादा के रोह अंचलाधिकारी (CO) भोला पासवान और सीतामढ़ी के DPO ओम प्रकाश का केस जरूर कराती है।
संडे बिग स्टोरी में समझते हैं, बिहार का निगरानी यानी विजिलेंस विभाग कैसे ‘गुलाबी जाल’ बिछाता है और कैसे रिश्वतखोर इसमें फंसकर बेनकाब होते हैं…।
सबसे पहले 3 केसेज, जिसमें फेनॉफ्थलीन ने सजा दिलाई
रिश्वतखोर/घूसखोर अफसर खुद को बचाने के लिए अदालत में कई तिकड़म भिड़ाते हैं, लेकिन फेनॉफ्थलीन की रिपोर्ट के आगे सब ढेर हो जाते हैं। इन 3 असली केसों से समझिए…
1. जब कंप्लेनर ही मुकर गया
नवादा के रोह अंचल के तत्कालीन CO भोला पासवान ने घर का छज्जा बनवाने की परमिशन के एवज में 4,000 रुपये मांगे थे। 2014 में विजिलेंस ने ट्रैप किया।
12 साल चले ट्रायल के दौरान आरोपी ने गवाह तोड़ लिए। यहां तक कि शिकायतकर्ता राकेश कुमार खुद कोर्ट में अपनी बात से पलट गया।
विजिलेंस के स्पेशन पीपी रितेश कुमार के अनुसार कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता भले बदल गया हो, लेकिन नोटों पर लगे फेनॉफ्थलीन की FSL रिपोर्ट झूठ नहीं बोलती। 22 जुलाई 2026 को विजिलेंस कोर्ट ने तत्कालीन CO को 4 साल तक की सजा और जुर्माना ठोक दिया।
2. विजिलेंस टीम पर ही सवाल उठा दिया
13 मई 2016 को सीतामढ़ी के तत्कालीन जिला योजना पदाधिकारी (DPO) ओम प्रकाश को उनके मजिस्ट्रेट कॉलोनी स्थित घर से 2 लाख रुपए रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया।
इनके खिलाफ खगड़िया के रहने वाले दीपक कुमार पालरिवाल ने शिकायत की थी। मामला यह था कि दीपक सरकारी स्कूलों में टेंडर लेकर डेस्क और बेंच की सप्लाई करते थे। उस वक्त इनका 40 लाख रुपए का बिल फंसा था।
ओम प्रकाश ने पहले खराब क्वालिटी का हवाला देकर बिल पास नहीं किया। फिर बाद में DM को 5 प्रतिशत का कमीशन देने के नाम पर रिश्वत के लिए मुंह खोला। उसने 2 लाख रुपए घूस मांगा था। लेकिन, दीपक रिश्वत देना नहीं चाहते थे।
- 28 अप्रैल 2016 को उन्होंने पटना विजिलेंस में कंप्लेन की। 12 मई 2016 को पूरे मामले की जांच हुई। फिर 13 अप्रैल 2016 को छापेमारी हुई। साथ ही इनके ऑफिस से कुछ महत्वपूर्ण फाइल भी जब्त की गई थी।
- विजिलेंस के स्पेशल पीपी कृष्ण देव साह बताते हैं, ‘ट्रायल के दौरान सजा से खुद को बचाने के लिए कई तरह के पैंतरेबाजी ओम प्रकाश ने की थी। उसने सबसे पहले विजिलेंस टीम पर सवाल खड़ा किया।’
- आरोप लगाया कि उन्हें पकड़ने वाले DSP एक्सटेंशन पर थे। उनके पास कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं था। उनके सवाल को इस तर्क से काटा गया कि सरकार ने उस वक्त डीएसपी की सेवा अवधि का विस्तार किया था। एक्सटेंशन के दौरान भी उन्हें पूरी कार्रवाई का अधिकार मिला हुआ था।
- फिर उसने कोर्ट को गुमराह करने के लिए सवाल उठाया था कि हम सामान्य प्रशासन विभाग के कर्मचारी हैं। हमारे खिलाफ कार्रवाई के लिए इसी विभाग के प्रधान सचिव का आदेश होना चाहिए था, जो नहीं है। तब इस तर्क के खिलाफ यह आधार दिया गया कि उन्हें पकड़ने वाले डीएसपी BPSC से बहाल हुए हैं। इसके लिए सरकार की नियमावली बनी हुई है। साथ ही लॉ सेक्रेटरी की ओर से केस चलाने का आदेश मिला हुआ है।
- ओम प्रकाश ने कोर्ट में कई तरह की चालें चली। पर जब ‘फेनॉफ्थलीन’ की FSL रिपोर्ट कोर्ट में पेश हुई तो उसकी हर चालबाजी धरी की धरी रह गई। 20 अप्रैल 2026 को उन्हें मुजफ्फरपुर विजिलेंस कोर्ट ने दोषी करार दिया।
- 6 मई 2026 को कोर्ट ने भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7 के तहत तीन साल जेल की सजा और 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। साथ ही 13(1)(D) की धारा के तहत 5 साल की सजा और 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया।
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3. जब एग्जीक्यूटिव इंजीनियर का एक हाथ गुलाबी हुआ
साल 2019 में ठेकेदार अखिलेश कुमार जायसवाल की कंपनी साज इन्फ्राकॉम प्रोजेक्ट इंडिया लिमिटेड को पथ निर्माण विभाग ने गोनवा मोड़ से अम्हारा तक रोड बनाने के लिए 40 करोड़ रुपए का टेंडर दिया था। तब पथ निर्माण विभाग में सुरेश प्रसाद सिंह पटना पश्चिम पथ प्रमंडल के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और शशि भूषण कुमार कैशियर थे।
टेंडर का एकरारनामा बनाने के नाम पर ठेकेदार से एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने कुल ठेका का एक प्रतिशत यानी 40 लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी। बहुत बात करने के बाद 0.8 प्रतिशत यानी 32 लाख रुपए पर डील तय हुई। मगर, ठेकेदार रिश्वत देना नहीं चाहते थे।
- ठेकेदार ने विजिलेंस मुख्यालय में शिकायत की। उस वक्त इंस्पेक्टर संजीव कुमार सत्यापनकर्ता बने। जांच में मामला सही पाया गया। इसके बाद 8 जून 2019 को ठेकेदार 14 लाख रुपए कैश लेकर पटना के पटेल नगर में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के घर पहुंचे।
- उस वक्त 2 हजार रुपए के नोटों के दो बंडल सुरेश प्रसाद ने एक हाथ से लेकर कैशियर शशि भूषण को गिनने के लिए दिया था और बाकी के रुपए मिलाकर रखने के लिए दिया था। जो टेबल पर रखे थे। उसी वक्त विजिलेंस के DSP इम्तियाज अहमद ने छापेमारी कर दी।
- प्रभारी स्पेशल पीपी किशोर कुमार सिंह बताते हैं, ‘खुद को बचाने के लिए एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने पूरी कोशिश की थी। मगर, टीम ने ‘सोडियम कार्बोनेट’ के घोल में जब उनका एक हाथ डाला तो वो गुलाबी हो गया था। क्योंकि, 2 हजार रुपए के नोटों के जिस बंडल को गिनने के लिए उन्होंने कैशियर को दिया था उस पर ‘फेनॉफ्थलीन’ लगा था।
- उसी वक्त जब इनके घर की तलाशी ली गई तो कमरे में दीवान पलंग के अंदर रखे 2 करोड़ 36 लाख 23 हजार रुपए कैश मिले थे। कई बैंक अकाउंट्स के पासबुक, अलग-अलग जमीनों के डीड और बीमा पॉलिसी के पेपर बरामद किए गए थे।
- इस केस में पटना की विजिलेंस कोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7(a) के तहत सुरेश प्रसाद सिंह को 4 साल की सजा दी और 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया। शशि भूषण कुमार को 4 साल की सजा मिली और 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया। साथ ही दूसरी धारा 12 के तहत शशि को तीन साल की सजा दी गई और 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया।’
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निगरानी ने तीनों अफसरों के खिलाफ कैसे बिछाया जाल
रिश्वतखोरों को रंगे हाथ दबोचने की प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक और कानूनी चक्रव्यूह पर आधारित होती है। इसे 4 चरणों में पूरा किया जाता है…
- वेरिफिकेशन: शिकायत मिलने के बाद विजिलेंस एक सिपाही या अफसर को सादे कपड़ों में शिकायतकर्ता के साथ भेजती है, जो छुपकर रिश्वत की मांग की पुष्टि करता है।
- आवाज का सबूत: बातचीत की गुप्त ऑडियो रिकॉर्डिंग की जाती है। FSL में वॉइस-मैच रिपोर्ट कोर्ट में दूसरा सबसे बड़ा सबूत बनती है।
- नोटों का रिकॉर्ड: रिश्वत में दिए जाने वाले हर एक नोट का सीरियल नंबर बाकायदा सरकारी कागजों पर दर्ज किया जाता है।
- फेनॉफ्थलीन का प्रहार: नोटों पर पाउडर लगाकर पीड़ित को भेजा जाता है। जैसे ही लेन-देन पूरा होता है, DSP के नेतृत्व में बाहर मुस्तैद टीम धावा बोल देती है और हाथों को घोल में डुबोकर गुलाबी रंग हासिल कर लेती है।
सजा दिलाने में पिछले साल टॉप पर रहा पटना
बिहार के अंदर विजिलेंस से जुड़े केस के ट्रायल के लिए पटना, मुजफ्फरपुर और भागलपुर में कोर्ट बने हुए हैं। रंगेहाथ रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने के केसों में इस साल जनवरी से लेकर अब तक में कुल 11 मामलों में आरोपियों को सजा दिलाई गई है।
हालांकि, 2025 में कुल 30 केसों में 38 रिश्वतखोरों को सजा दिलाई गई है। इसमें पटना सबसे टॉप पर रहा है। क्योंकि, इसमें अकेले 28 केस पटना विजिलेंस कोर्ट के थे।
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कानून में कितनी मिलती है सजा?
विजिलेंस के स्पेशल पीपी विजय भानू के मुताबिक, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सजा के कड़े प्रावधान हैं।
- धारा 7: कम से कम 3 साल और अधिकतम 7 से 10 साल तक की जेल।
- धारा 13(2): कम से कम 4 साल और अधिकतम 10 साल तक की कैद के साथ भारी आर्थिक जुर्माना।
विजिलेंस के DG जितेंद्र सिंह गंगवार कहते हैं, ‘बदलते जमाने के साथ रिश्वतखोरों ने भी तरीका बदल लिया है। अब वे नगदी की जगह UPI और ऑनलाइन डिजिटल ट्रांसफर का सहारा ले रहे हैं। लेकिन विजिलेंस भी एक कदम आगे की तैयारी कर चुकी है। हम जल्द ‘इलेक्ट्रॉनिक एंड साइबर टेक्नोलॉजी सेंटर’ (ECTC) स्थापित करने जा रहे हैं, जिसकी बिल्डिंग विजिलेंस हेडक्वार्टर में तैयार हो रही है। अब डिजिटल रिश्वत लेने वाले भी किसी कीमत पर नहीं बचेंगे।’