‘10 साल हो गए, बेटे का अगला गुरुवार नहीं आया’:भारत भवन की मशहूर कलाकार भी वृद्धाश्रम में, बोलीं- बेटा विदेश में, अब आश्रम ही परिवार

मोतियाबिंद की समस्या थी, तब एक मिठाई वाले ने मंदिर के सामने से लाकर आश्रम छोड़ दिया। एक बार बेटा आया था और बोला- अगले गुरुवार को आऊंगा। वह फिर कभी नहीं आया…”

80 साल की अंजली श्रीवास्तव जब ये बातें कहती हैं तो उनकी आंखों में 10 साल पुराना इंतजार और बेटे के लौट आने की टिमटिमाती उम्मीद साफ झलकती है।

भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में पसरा यह सन्नाटा और अपनों का दर्द हाल ही में हुई एक घटना के बाद फिर नुमाया हो उठा।

70 साल के कारोबारी की मौत, 4 बच्चों में से कोई नहीं पहुंचा

4 अगस्त को आश्रम में रहने वाले 70 वर्षीय बुजुर्ग घनश्याम की मौत हो गई। दो दिन तक उनका शव इस उम्मीद में रखा रहा कि शायद कोई अपना आएगा। मृतक के दो बेटे और दो बेटियां हैं, लेकिन कोई नहीं पहुंचा। आखिरकार पुलिस और आश्रम के सेवादारों ने ही उनका अंतिम संस्कार किया। इस घटना ने आश्रम में रह रहे अन्य बुजुर्गों को अंदर तक हिला दिया।

रंगमंच की मशहूर आर्टिस्ट से लेकर गुमनामी के अंधेरे तक

आश्रम में रह रहीं रानी चंद्र सक्सेना की कहानी भी कम झकझोरने वाली नहीं है।

  • भारत भवन की सम्मानित कलाकार: 1980 में भारत भवन जॉइन करने वाली रानी चंद्र ने रंग निर्देशक बाबा कारंत के साथ कई बड़े नाटकों में काम किया। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से पुरस्कार भी मिला था।
  • रेडियो व दूरदर्शन का सफर: नाटकों के बाद उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन में बतौर समाचार वाचक काम किया।
  • विदेश में बेटा, लेकिन आश्रम ही परिवार: रानी के पति फिशरीज विभाग में डायरेक्टर थे। उनका एक बेटा विदेश में रहता है। पारिवारिक कड़वाहट के कारण उन्होंने 15 साल पहले आश्रम की राह चुनी।

रानी चंद्र का कहना है- मेरा बेटा विदेश से यहां आएगा, यह संभव नहीं है। अब माधुरी जी (आश्रम संचालिका) ही मेरा अंतिम संस्कार करेंगी। जो कुछ है, अब यही मेरा परिवार है।

‘दूसरों का हश्र देख डर लगता है कि हमारा क्या होगा’

आश्रम के एक अन्य बुजुर्ग सुधीर के पिता गैस एंड पावर प्लांट में सुपरवाइजर थे। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें आश्रम आना पड़ा। वे कहते हैं- आए दिन ऐसी घटनाएं देखते हैं कि मौत के बाद भी परिवार वाले नहीं आते। फिर चिंता होने लगती है कि हमारा क्या होगा? लेकिन अब जो है, यहीं खुश रहने की कोशिश करते हैं।

‘कोई मां-बाप अपनी मर्जी से घर की दहलीज नहीं लांघता’

30 सालों से बुजुर्गों की सेवा कर रही आश्रम संचालिका माधुरी मिश्रा बताती हैं कि कोई भी बुजुर्ग खुशी से अपना घर नहीं छोड़ता। जब वे घर से निकलते हैं तो एक जिंदा लाश की तरह जीवन जीते हैं। जब किसी बुजुर्ग के निधन पर परिवार वाले नहीं आते तो बाकी बुजुर्ग डर जाते हैं। वे सोचने लगते हैं कि क्या अंतिम समय में वे भी ऐसे ही अकेले रह जाएंगे?

दुखद यह है कि यह बेरुखी सिर्फ विदेश या दूसरे शहरों में रहने वालों की नहीं है। भोपाल में ही रहने वाले कई रिश्तेदार भी अंतिम समय में नहीं पहुंचते और बुजुर्गों को बोझ मानकर पल्ला झाड़ लेते हैं।