“बिहार इज नॉट फॉर बिगिनर्स…”
ये लाइन आपने भी कई बार सुनी होगी, लेकिन मुंगेर के कल्याणपुर में इस लाइन का एक अलग ही मतलब दिखाई देता है। मलेशिया के जिस ट्विन टावर को खड़ा करने में स्टील, कंक्रीट और मॉडर्न इंजीनियरिंग लगी, उसकी सिर्फ एक फोटो देखकर यहां के कारीगर पूरा पंडाल खड़ा कर रहे हैं।
दरअसल, मुंगेर के कल्याणपुर में पिछले कई सालों से दुर्गा पूजा के लिए हर बार एक नई और अलग थीम पर पंडाल तैयार किया जाता है। इस बार यहां मलेशिया के ट्विन टावर को थीम बनाया गया है। करीब 170 फीट ऊंचा यह पंडाल तैयार होते ही पूरे इलाके के आकर्षण का केंद्र बनने वाला है।
खास बात यह है कि इसे बनाने वाले कारीगर मुस्लिम हैं। वो करीब 3 महीने से मांस-मछली को त्याग कर चुके हैं। ये सभी कारीगर अब दशहरा के बाद ही खाएंगे।
ये कारीगर तस्वीरों में दिखने वाली देश-दुनिया की मशहूर इमारतों को बांस, लकड़ी और कपड़े के सहारे जमीन पर उतारते हैं।
70 मुस्लिम कारीगर कर रहे तैयार
दैनिक भास्कर की टीम मुंगेर जिला मुख्यालय से करीब 80KM दूर कल्याणपुर पहुंची। इस दौरान हमारी टीम को जो दिखा वो इस पूरी खबर में बयां किया गया है। अभी के समय वहां पर जमीन पर बांस के ढेर हैं, ऊपर लकड़ी का जंगल और इनके बीच झारखंड के 70 मुस्लिम कारीगर मौजूद हैं।
कोई रस्सी कस रहा है, कोई बांस को नापकर काट रहा है, कोई लकड़ी की चौखट बना रहा है तो कोई दूर खड़े होकर पूरे स्ट्रक्चर का आकार देख रहा है। यहां मशीनों का शोर कम है, हथौड़े और आरी की आवाज ज्यादा है।
इंजीनियर का नक्शा नहीं है, कंप्यूटर की डिजाइन नहीं है और किसी आर्किटेक्ट की टीम भी नहीं है। कारीगरों के हाथ में सिर्फ एक तस्वीर है। उसी तस्वीर को देखकर वे दुनिया की मशहूर इमारत को बांस, लकड़ी, कपड़े और रस्सी में उतार रहे हैं।
कल्याणपुर में इस बार मां दुर्गा के लिए मलेशिया के ट्विन टावर की थीम पर करीब 170 फीट ऊंचा और 150 फीट चौड़ा पंडाल तैयार किया जा रहा है। इसके साथ मलेशिया की दूसरी इमारतों, ब्रिटिश पार्लियामेंट, विक्टोरिया हाउस जिसमें भोलेनाथ विराजमान होंगे, सड़क और गलियों का सेट भी तैयार किया जा रहा है। पूरे पंडाल को बनाने में करीब 3 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है।
तस्वीर में जितनी इमारत, बांस में उतनी ही उतारने की कोशिश
कारीगर मोहम्मद लुकमन बताते हैं, हमें जिस इमारत या जगह की तस्वीर दी जाती है, सबसे पहले हमलोग उसे ध्यान से समझते हैं। इमारत की ऊंचाई कितनी है, चौड़ाई कितनी है, कहां कौन-सा हिस्सा निकला हुआ है, दोनों टावरों के बीच कितनी दूरी है इसी हिसाब से बांस और लकड़ी की स्ट्रक्चर खड़ी की जाती है।
वे कहते हैं, कोशिश यही रहती है कि सामने से देखने पर पंडाल उसी तस्वीर जैसा दिखाई दे। यह काम सुनने में जितना आसान लगता है, जमीन पर उतना ही मुश्किल है।
170 फीट की स्ट्रक्चर को सिर्फ बांस के सहारे खड़ा करना है। हर जोड़ को मजबूती देनी है। ऊपर की ऊंचाई के साथ नीचे का संतुलन भी बनाए रखना है। कहीं मामूली गलती हुई तो पूरी संरचना का आकार बिगड़ सकता है।
इसी वजह से पहले बांस का ढांचा तैयार होता है। फिर लकड़ी और प्लाई से उसे मजबूती दी जाती है। उसके बाद कपड़े और दूसरे सामान से बाहरी आकार को बनाया जाता है। लास्ट में रंग, सजावट और रोशनी के जरिए उसे असली इमारत का रूप देने की कोशिश होती है।
अकेले ट्विन टावर की स्ट्रक्चर में करीब 20 हजार बांस लगाए जा रहे हैं। पूरे पंडाल और इससे जुड़े निर्माण में यह संख्या बढ़कर करीब 30 हजार बांस तक पहुंच रही है।
पुराने कारीगर से नई पीढ़ी सीख रही
मोहम्मद लुकमन कहते हैं, इस काम के पीछे किसी इंजीनियरिंग कॉलेज की पढ़ाई नहीं है। न ही मैंने किसी विशेष तकनीकी संस्थान से ट्रेनिंग ली है।
वे बताते हैं, “हमारे साथ जो कारीगर आए हैं, उन्हें देखकर आने वाली पीढ़ी भी सीख रही है। एक कारीगर के पीछे दूसरा कारीगर तैयार होता है। आज जो हमारे साथ काम कर रहा है, वह कल खुद कारीगर बन जाएगा।”
यही वजह है कि यहां काम करते हुए उम्र और अनुभव की एक पूरी सीढ़ी दिखाई देती है। कोई बांस पकड़कर सीख रहा है, कोई जोड़ बनाना सीख रहा है और कोई पहले से ही बड़े हिस्से की संरचना संभाल रहा है।
एक कारीगर दूसरे का काम देखता है और धीरे-धीरे वही हुनर उसके हाथ में आ जाता है।
मोहम्मद सिराज पिछले करीब 10-12 सालों से बिहार आकर पंडाल बनाने का काम कर रहे हैं। वे बताते हैं, हर साल अलग थीम होती है और हर बार नई चुनौती।
इस बार भी अलग-अलग हिस्सों के लिए तस्वीरों और डिजाइन को आधार बनाया गया है। पंडाल बनाने के लिए अलग इंजीनियर की जरूरत नहीं पड़ती। सालों से इस काम को करते हुए कारीगरों ने अपने अनुभव से यह हुनर विकसित किया है।
इस समय मेरे साथ करीब 45 मजदूर एक हिस्से पर काम कर रहे हैं। निर्माण में बांस के अलावा लकड़ी, कपड़ा और दूसरे सामान का इस्तेमाल हो रहा है।
मोहम्मद सिराज बताते हैं कि पंडाल का काम शुरू हुए करीब 3 महीने हो चुके हैं और अंतिम रूप देने में अभी कुछ दिन और लगेंगे।
झारखंड से आते हैं, बिहार में पहचान मिली
मोहम्मद आलम भी झारखंड से आए हैं। उनके लिए बिहार में दुर्गापूजा के दौरान पंडाल बनाना हर साल का हिस्सा है।
वे बताते हैं, पहले डिजाइन और आकार को समझा जाता है। फिर उसी हिसाब से बांस और लकड़ी की संरचना खड़ी की जाती है। उसके बाद कपड़े और दूसरी सामग्री लगाकर उसे अंतिम रूप दिया जाता है।
इस काम में सबसे महत्वपूर्ण चीज अनुभव है। इतनी बड़ी संरचना तैयार करने के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन-सा बांस कहां लगाया जाए, किस हिस्से को कितना सपोर्ट दिया जाए और किस जगह वजन को कैसे बांटा जाए।
उनका कहना है कि दुर्गापूजा के दौरान बिहार आकर काम करना उन्हें अच्छा लगता है। यहां उन्हें सम्मान भी मिलता है और काम की पहचान भी।
भागलपुर में रहकर की पढ़ाई, कोलकता से लिया डिग्री
पंडाल के आयोजक डॉ.नीतीश चंद्र दुबे ने बताया, मैं मुंगेर का रहने वाला हूं। मेरे पिताजी डॉक्टर थे। इसी वजह से हम भाई-बहन भागलपुर में ही रहकर शुरुआती पढ़ाई किए हैं। हालांकि, हर साल गर्मी छुट्टी में गांव आया करते थे।
12वीं पास करने के बाद मुझे भी पापा की तरह डॉक्टर बनना था। इसी वजह से मैंने कलकत्ता से होम्योपैथी की पढ़ाई की। वहां से डिग्री लेने के बाद मैंने मुंगेर, भागलपुर, कलकत्ता, दिल्ली समेत UP में अलग-अलग क्लिनिक खोले।
विदेश में देखा ट्विन टावर, सोचा-गांव के लोगों को भी दें वही अनुभव
डॉ.नीतीश चंद्र दुबे ने बताया, देश-विदेश में होम्योपैथी को लेकर होने वाले सम्मेलनों में मैं शामिल होते रहता हूं। इस बार मेरा सम्मेलन ब्रिटिश पार्लियामेंट में हुआ था। इसके अलावा मैं मलेशिया भी गया था।
जहां मैंने ट्विन टावर को करीब से देखा। वहीं से मेरे मन में विचार आया कि जो लोग मलेशिया नहीं जा सकते, उन्हें उनके गांव में ही दुनिया की इस मशहूर इमारत का अनुभव क्यों न कराया जाए।
कल्याणपुर में हर साल दुर्गापूजा के लिए अलग-अलग देशों और शहरों की चर्चित इमारतों को थीम बनाया जाता है। यहां पहले बुर्ज खलीफा, थाईलैंड का अरुण मंदिर, जयपुर का हवा महल और मुंबई का ताज होटल जैसे पंडाल बनाए जा चुके हैं।
इस बार मलेशिया के ट्विन टावर के साथ ब्रिटिश पार्लियामेंट की प्रतिकृति भी तैयार की जा रही है। ब्रिटिश पार्लियामेंट वाले पंडाल में भगवान भोलेनाथ के विराजमान होने की योजना है।
झरने की आवाज, 10 हजार घंटियां और लेजर शो
इस बार पंडाल की सजावट भी पहले से अलग होगी। डॉ.दुबे के मुताबिक, पूरे रास्ते को झरने की थीम पर सजाया जाएगा। श्रद्धालुओं को ऐसा अनुभव कराने की कोशिश होगी कि वे झरने के बीच से गुजर रहे हों।
पूरे परिसर में करीब 10 हजार घंटियां लगाई जाएंगी, जिससे लगातार घंटियों की आवाज के बीच भक्तिमय माहौल बनेगा।
इसके अलावा लेजर लाइट शो भी कराया जाएगा। इस तरह का लेजर शो इस इलाके में पहली बार इतने बड़े स्तर पर किया जा रहा है। इसकी रोशनी कई किलोमीटर दूर से दिखाई देने की तैयारी है।
पूरे गांव के लोग पंडाल में करते हैं सहयोग
डॉ.दुबे ने आगे बताया, कल्याणपुर की आबादी करीब 10 हजार है। यहां दुर्गापूजा सिर्फ दस दिन का त्योहार नहीं है। इसकी तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है।
किसी घर से 10 रुपए का सहयोग आता है तो कोई 50 रुपए देता है। आर्थिक रूप से सक्षम लोग लाखों रुपए तक सहयोग करते हैं। बांस और लकड़ी की व्यवस्था में भी ग्रामीण मदद करते हैं।
यानी दो करोड़ रुपए के आसपास का आयोजन किसी एक व्यक्ति या एक परिवार के पैसे से नहीं चलता। इसके पीछे छोटे-छोटे सहयोगों का बड़ा नेटवर्क है।
गरीब मजदूर भी इसमें हिस्सेदार हैं और आर्थिक रूप से संपन्न परिवार भी। कोई पैसा देता है, कोई सामान देता है और कोई श्रम। इसी वजह से आयोजन समिति इसे सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि पूरे गांव का सामूहिक आयोजन बताती है।
यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। इस बार बड़े कलाकारों के कार्यक्रम की तैयारी है। समिति के अनुसार अष्टमी पर पवन सिंह, नवमी पर भरत शर्मा और गायक मोहम्मद इरफान, जबकि दशमी पर कल्पना पटवारी और शब्बीर कुमार के कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। गोरखपुर सांसद और अभिनेता रवि किशन के पहुंचने की भी बात कही गई है।
पवन सिंह से लेकर रवि किशन तक आएंगे पंडाल
दुर्गापूजा मेले के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। समिति के अनुसार, अष्टमी को भोजपुरी गायक पवन सिंह, नवमी को लोकगायक भरत शर्मा और गायिका कल्पना पटवारी प्रस्तुति देंगे।
विजयदशमी के दिन गायक शब्बीर कुमार, अभिनेता राजपाल यादव और कल्पना पटवारी के कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।
गोरखपुर सांसद और अभिनेता रवि किशन भी कल्याणपुर पहुंचकर कार्यक्रम में शामिल होंगे। मनोज तिवारी के आने की भी संभावना जताई गई है।
AI कैमरों से होगी पंडाल की निगरानी
डॉ. दुबे ने बताया कि पिछले साल पूजा के दौरान यहां 10 लाख से अधिक लोगों की भीड़ जुटी थी। इस बार संभावित भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को भी हाईटेक किया जा रहा है।
पूरे परिसर में AI कैमरों से भीड़ की निगरानी की जाएगी। कैमरों के जरिए किसी संदिग्ध गतिविधि या व्यक्ति की पहचान कर उसे ट्रैक करने में मदद मिलेगी।
सुरक्षा के लिए समिति की ओर से 200 से अधिक पुरुष और 50 महिला बाउंसर तैनात किए जाने की तैयारी है।
इसके अलावा जिला प्रशासन और पुलिस की ओर से भी पर्याप्त संख्या में जवानों की तैनाती की जाएगी।