‘1971 के युद्ध में मैंने आपके बेटे को मारा’ पढ़ें- पाकिस्तान में बेटे के कातिल से मुलाकात की पूरी स्टोरी

3 दिसंबर सन 1971.. इतिहास में कभी ना भूलने वाला दिन। इसी दिन भारत और पाकिस्तान के बीच जंग की शुरुआत हुई थी। भारतीय सेना ने अदम्य साहस और शौर्य के बलबूते महज 13 दिनों के भीतर पाकिस्तानी सेना को घुटने पर ला दिया। 16 दिसंबर को युद्ध समाप्ति की घोषणा हुई। इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। युद्ध में कई जवान शहीद हुए। इनमें एक नाम 21 वर्षीय अरुण खेत्रपाल का भी है। पिता ब्रिगेडियर मदनलाल खेत्रपाल जिस कालेज से पढ़े, उसी में पढ़े और पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर नसीर (युद्ध के समय मेजर) ने 30 साल बाद इनसे अरुण खेत्रपाल को युद्ध के मैदान में मारने की बात कबूली थी।

शहीद अरुण के छोटे भाई मुकेश खेत्रपाल कहते हैं कि पिता मदनलाल खेत्रपाल 1965 की लड़ाई में शामिल थे। उन्होने निर्णय लिया था कि अरुण आइआइटी से पढ़ाई करेगा जबकि मैं सेना में भर्ती होऊंगा। हम दोनों की परवरिश युद्ध से जुड़ी कहानियां सुनते हुए हुई है। अरुण बचपन से ही सेना में भर्ती होना चाहता था। हम दोनों भाइयों ने दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल और हिमाचल प्रदेश के सनावर स्थित बोर्डिंग स्कूल से पढ़ाई की। पिता सेना में चीफ इंजीनियर थे और मथुरा में वन कोर में तैनात थे।

पिता के कहे अनुसार अरुण ने आइआइटी समेत एनडीए में भी भाग्य आजमाया। आइआइटी का परिणाम पहले आया। पिता ने अरुण को दाखिला लेने की सलाह दी। लेकिन चंद दिनों बाद एनडीए में दाखिले के संदर्भ में परिणाम आया तो अरुण की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वो एनडीए में दाखिले का पात्र था। मां से लगातार गुजारिश करता रहा कि वो सेना में भर्ती होना चाहता है। आखिरकार पिता मान गए।

इसके बाद एनडीए और आइएमए करने के बाद उसने पूना हार्स ज्वाइन किया। यहां नियुक्ति के बाद जवानों को तीन महीने की ट्रेनिंग अहमदाबाद में करनी होती है। जिसे यंग अफसर कोर्स भी कहते हैं। इस स्पेशल कोर्स को करने के लिए वो गए भी। लेकिन अभी ट्रेनिंग पूरी होती उसके पहले ही भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। स्कवाड्रन कमांडर अरुण खेत्रपाल, कैप्टन मलहोत्रा और लेफ्टिनेंट अहलावत ने तीन टैंक के साथ कूच किया।

अरुण खेत्रपाल ने दुश्मनों के कई टैंक ध्वस्त कर दिए। अंत में एक समय ऐसा आया कि पाकिस्तानी मेजर नसीर और अरुण खेत्रपाल का आमना-सामना हुआ। बकौल मुकेश खेत्रपाल, अरुण के टैंक पर एक गोला गिर गया था, टैंक में आग पकड़ ली थी। उसे तत्काल टैंक से उतरने को कहा गया लेकिन उन्होंने कहा कि अभी गन चल रही है लिहाजा नीचे नहीं उतर सकते। इस बीच एक गोला टैंक पर गिरा और अरुण शहीद हो गए।

30 साल बाद कबूलनामा

बकौल मुकेश, पिता मदनलाल खेत्रपाल पाकिस्तान स्थित पैतृक निवास सरगोदा जाना चाहते थे। पिता ने लाहौर के गवर्नमेंट कालेज से पढ़ाई की थी। कालेज ने 2001 में आने का न्योता दिया। ब्रिगेडियर नसीर के लाहौर स्थित आवास पर बतौर अतिथि ठहरे थे। ब्रिगेडियर नसीर ने भी इसी कालेज से पढ़ाई की थी। नसीर आए और मदनलाल से कहा कि मैं आपसे एक बात स्वीकारना चाहता हूं। मैंने ही आपके बेटे को 1971 के जंग में मारा। ब्रिगेडियर मदनलाल हैरान थे। पूछा आपको कैसे पता कि वो मेरा बेटा था। नसीर ने कहा कि सीजफायर की घोषणा के अगले दिन मैंने पता किया था कि वो जांबाज कौन था, जो आखिरी तक पत्थर की तरह टिका रहा। वो बहुत बहादुर था। पता चला कि वो शहीद हो गया। लेखिका रचना बिष्ट रावत ने अपनी किताब 1971 चार्ज आफ द गोरखा एंड अदर स्टोरीज में इस पर विस्तार से लिखा है।