MP Politics: मामा से बुलडोजर मामा बने शिवराज सिंह चौहान एक्शन में और कांग्रेस नींद में

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बेहद रोमांचक शो के बाद यद्यपि अगला मुकाबला इस साल के अंत में गुजरात विधानसभा चुनाव में होना है, पर राजनीतिक पंडितों से लेकर आम आदमी तक की अपेक्षाकृत अधिक दिलचस्पी अगले साल के अंत में प्रस्तावित मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में दिखने लगी है। इस चुनाव में अभी डेढ़ साल से अधिक समय शेष है, पर चुनावी सियासत में रुचि रखने वाले लोग अभी से कयासबाजी करने लगे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रति दिलचस्पी की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस चुनाव के केवल कुछ महीने बाद वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं।

जाहिर है, लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस को अंतिम नेट प्रैक्टिस करके देश के जनमानस की थाह लेने का मौका मिलेगा। मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटें धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से खासी विविधतापूर्ण हैं, लिहाजा दोनों राष्ट्रीय दलों को यहां के नतीजों के आधार पर अपनी रणनीतिक तैयारी में सुधार-संशोधन करने में सुविधा होगी।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस भूमिका में अपनी चौथी पारी खेल रहे हैं। यह भूमिका निभाते हुए एक सप्ताह पहले उन्होंने एक रिकार्ड भी बनाया। अब वह किसी भी दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्री से अधिक लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री बन चुके हैं। उनका कार्यकाल 15 साल 15 दिन से अधिक हो चुका है। पिछला विधानसभा चुनाव 2018 में हुआ था जिसमें बेहद कड़े मुकाबले में कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छीन ली थी, यद्यपि कमल नाथ के नेतृत्व में केवल 15 महीने बाद यह सरकार कांग्रेस के आंतरिक बिखराव से गिर गई और शिवराज सिंह के ही नेतृत्व में भाजपा फिर सत्तासीन हो गई।

अपने चौथे कार्यकाल में शिवराज सिंह ने परिश्रम का भी रिकार्ड बनाया है। शायद 2018 के प्रतिकूल अनुभव की वजह से वह अतिरिक्त श्रम कर रहे हैं। इसके अलावा सत्ता संचालन में वह कोई भी ऐसा नुस्खा आजमाने में संकोच नहीं कर रहे जिसके जरिये सामाजिक समूहों को आकर्षित किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश चुनाव के बुलडोजर बाबा के तर्ज पर बुलडोजर मामा वाली छवि सबसे ताजा टोटका है, यद्यपि इससे पहले शिवराज सिंह कई अन्य चर्चित कदम उठा चुके हैं। उनकी कन्या-कल्याण योजनाएं अपने प्रभाव के कारण कई अन्य राज्यों द्वारा अपनाई जा चुकी हैं। इसके अलावा प्रत्येक शासकीय समारोह की शुरुआत कन्या पूजन से करने और खुद मुख्यमंत्री द्वारा प्रतिदिन एक पौधा रोपने जैसे नवाचार खासे लोकप्रिय हैं। इसी के साथ शासकीय कार्यो में व्यस्तता के बावजूद अधिकतर लोक-समारोहों में शामिल होकर समरस भाव से आनंदमग्न होने का उनका व्यवहार उनकी लोकप्रियता के आधार को अधिक मजबूत कर रहा है। लोक कल्याण और अपराध नियंत्रण के मोर्चो पर भी शिवराज सिंह सरकार की उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं।

अब नजर डालते हैं, मध्य प्रदेश में भाजपा के इकलौते प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की तैयारी पर। मध्य प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से अपने दो अति-वरिष्ठ नेताओं दिग्विजय सिंह और कमल नाथ के कंधों पर सवार है, यद्यपि इन दोनों नेताओं की चाल-ढाल में अपेक्षित तालमेल न होने के कारण अकसर पार्टी लड़खड़ाती दिखती है। पार्टी की इस समस्या पर खुद दिग्विजय सिंह पिछले दिनों कार्यकर्ताओं को चेतावनी दे चुके हैं कि कांग्रेस अब हारी तो फिर कभी नहीं जीतेगी। जाहिर है कि कांग्रेस अगले विधानसभा चुनाव को खुद के लिए महत्वपूर्ण तो मानती है, इसके बावजूद पार्टी इस मुकाबले के लिए मैदान में नजर नहीं आ रही।

मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस की मौजूदा कमजोरी पर भाजपा बेशक खुश होगी, इसके बावजूद इसे लोकतंत्र की मजबूती के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। ऐसा भी नहीं है कि मध्य प्रदेश में विपक्ष को ताकत देने के लिए मुद्दों का अभाव है। कांग्रेस के नेता अपने भाषण में मुद्दों का जिक्र भी करते हैं, पर किसी भी मुद्दे को लेकर कांग्रेस सड़क पर उतरने की हिम्मत नहीं जुटाती। विधानसभा चुनाव में अब भी डेढ़ साल बाकी हैं। कांग्रेस के पास अवसर है कि वह निष्क्रियता त्यागकर खुद को चैतन्य करे और सरकार को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति बनाकर मैदान में उतरे। यदि पार्टी तुरंत ऐसा नहीं कर पाएगी तो उसके वरिष्ठतम नेता दिग्विजय सिंह खुद भविष्यवाणी कर चुके हैं कि इस बार नहीं तो फिर कभी नहीं।