कानपुर जू में घड़ियाल के 15 बच्चों का जन्म:रेत में छिपे अंडों से बाहर आए, पक्षियों से बचाने के लिए ग्रीन नेट लगे; 2 डॉक्टर देखरेख कर रहे

कानपुर जू में 12 साल बाद घड़ियाल के 15 बच्चों का जन्म हुआ है। ये पहली सफल ब्रीडिंग हुई है, 2017 में रेस्क्यू कर लाए गए घड़ियाल के जोड़े से 15 अंडे हुए। अभी तक चिड़ियाघर में घड़ियाल का एक जोड़ा था, लेकिन अब 14 बच्चे होने के बाद यहां कुल संख्या 17 हो गई है।

मादा ने करीब दो महीने तक अंडों को सहेज कर रखा। इन बच्चों को पक्षियों से बचाने के लिए अलग से ग्रीन नेट से कवर किया गया है। इसके बाद जू प्रशासन ने बच्चों की रखवाली के लिए दो डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई है। दैनिक भास्कर ने जू के निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल और डॉ. नासिर से बात की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट-

डॉ. नासिर ने बताया कि मार्च महीने की शुरुआत में जू में तीन घड़ियाल थे, जिनमें दो मादा और एक नर थे। एक नर और मादा घड़ियाल के बीच लड़ाई हो गई थी। इस इंजरी के चलते दो महीने पहले ही एक मादा घड़ियाल की मौत हो गई थी।

जब डॉ. नासिर ने उसका पोस्टमॉर्टम किया, तो अंदर अंडे मिले। इसके बाद डायरेक्टर डॉ. कन्हैया पटेल ने एक अनोखा फैसला लिया। उन्होंने नर और बची हुई मादा घड़ियाल को एक साथ लाने की योजना बनाई। घड़ियालों के प्राकृतिक माहौल के लिए बाड़े के अंदर दो ट्रॉली बालू डलवाई गई। मादा घड़ियाल ने इसी में दो से ढाई फीट गहरी बालू के अंदर अपने अंडों को छुपाया, उसके 60 से 70 दिनों के बाद इनसे 15 नन्हे बच्चे अंडों से बाहर आ गए।

जन्म होने के बाद बनते है ‘नर और मादा’

डॉ. नासिर के मुताबिक, घड़ियालों के बच्चों का जेंडर (नर या मादा होना) पूरी तरह से तापमान पर निर्भर करता है। अगर रेत का तापमान हाई (ज्यादा) हो तो अंडों से मादा घड़ियाल बनती हैं, और अगर तापमान लो (कम) हो तो नर घड़ियाल पैदा होते हैं। मादा घड़ियाल बालू के अंदर अंडों को छुपाकर बीच-बीच में पैरों से उन्हें हिलाती रहती है, ताकि बच्चे सुरक्षित रहें।

7 दिन बगैर खाना-पानी के बच्चे रहेंगे

निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल ने बताया कि जन्म के बाद शुरुआती एक सप्ताह (7 दिन) तक ये बच्चे कुछ भी नहीं खाते हैं। दरअसल, अंडों के अंदर जो पीले रंग की जर्दी होती है, वह बच्चों के शरीर में ही मौजूद रहती है। इसी से उन्हें शुरुआती एनर्जी मिलती है। इसलिए इनका डाइट चार्ट अलग बनता है।

7 दिन बाद छोटी मछली और चिकन का कीमा दिया जाएगा

अभी इन बच्चों का वजन महज 25 से 30 ग्राम है। इन बच्चों को उनके बॉडी वेट का सिर्फ 7 से 8 प्रतिशत खाना ही दिया जाएगा। सात दिन पूरे होने के बाद इन्हें छोटी मछली, चिकन का कीमा, कैल्शियम और विटामिन D3 दिया जाएगा ताकि इनकी हड्डियां मजबूत हो सकें।

पक्षियों से बचाने के लिए ‘ग्रीन नेट’ का सुरक्षा कवच

प्रेडेटर्स (शिकारी पक्षियों) जैसे चील और कौवों से बचाने के लिए जू प्रशासन ने पूरे बाड़े के ऊपर हरे रंग की जाली (Green Net) लगा दी गई है। साथ ही, बच्चों की 24 घंटे निगरानी के लिए दो स्टाफ कर्मियों की स्पेशल ड्यूटी लगाई गई है। गर्मी से बचाने के लिए तालाब के पुराने गर्म पानी को लगातार निकालकर उसमें पंप से ठंडा और ताजा पानी डाला जा रहा है, ताकि बच्चों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे।

रेस्क्यू सेंटर से ‘पेरेंट्स’ बनने तक का सफर

डॉ. नासिर के मुताबिक, यहां मौजूद घड़ियाल रेस्क्यू करके लाए गए थे। साल 1995 और 2005 में मादा घड़ियाल लाई गई थीं, जबकि 2017 में एक नर घड़ियाल लाया गया था जो उस वक्त बहुत छोटा था और अब करीब 10 साल का हो चुका है। घड़ियालों का लाइफ स्पैन (औसत उम्र) 45 से 50 साल होता है। कानपुर जू के इतिहास में यह पहली घड़ियाल के बच्चों ने जन्म लिया है, ये हम लोगों के बड़ी उपलब्धि है। आमतौर पर घड़ियाल के बच्चों के जन्म के बाद 20% संकट होता है, लेकिन हमारी कोशिश है,10 से अधिक बच्चों को सुरक्षित बचा लेंगे।