गयाजी में एक तीन साल का मासूम 30 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया। हादसा गुरुवार शाम करीब 7:30 बजे के करीब हुआ। बच्चे के गिरते ही चीख-पुकार मच गई।
बोरवेल में गिरे बच्चे की पहचान रंगू नगर निवासी दिनेश मांझी के बेटे पीयूष कुमार के रूप में की गई है। घटना के तुरंत बाद स्थानीय ग्रामीणों ने इसकी सूचना पुलिस और प्रशासन को दी।
जिसके बाद स्थानीय प्रशासन, SDRF-NDRF ने मोर्चा संभाला। करीब 7 घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद पीयूष को सुरक्षित निकाला गया। जिसके बाद सभी ने राहत की सांस ली।
खेलते-खेलते बोरवेल में गिरा
पीयूष गुरुवार शाम करीब साढ़े सात बजे घर के पास ही खेल रहा था। पीयूष की मां बोरवेल के पास खाट बिछा रही थी। पीयूष के हाथ में मोबाइल था। खेलते-खेलते वह अचानक वहां खुले पड़े बोरवेल के नजदीक पहुंच गया और पैर फिसलने से सीधे अंदर गिर गया।
गनीमत यह रही कि वह पूरे 300 फीट नीचे नहीं गया और ऊपर से करीब 30 फीट की गहराई पर ही अटक गया, जहां से उसका सिर दिखाई दे रहा है। घटना गुरपा थाना क्षेत्र के रंगू नगर की है।
अब जानिए कैसे 7 घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद बच्चे को निकाला गया
बोरवेल के समानांतर गड्ढा खोदा गया
हादसे की खबर मिलते ही हजारों की भीड़ जुट गई। पुलिस और स्थानीय प्रशासन (वजीरगंज कैंप डीएसपी सुनील कुमार पांडेय, सीओ अमित सिंह, बीडीओ शशि भूषण साहू) मौके पर पहुंचे।
शुरुआत में स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने राहत और बचाव कार्य शुरू किया। बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बोरवेल के समानांतर जेसीबी मशीनों की मदद से तेजी से गड्ढा खोदा गया, लेकिन इससे निकालना मुश्किल था।
4 घंटे बाद NDRF की टीम पहुंची
मामले की गंभीरता को देखते हुए पटना से एसडीआरएफ टीम को तत्काल मौके पर बुलाया गया। बच्चे के गिरने के करीब 4 घंटे बाद एनडीआरएफ की टीम को बुलाया गया।
करीब 12.30 बजे NDRF टीम मौके पर पहुंची। शुरुआत में टीम ने पाइप के जरिए बच्चे को बाहर निकालने की कोशिश की लेकिन बोरवेल की बनावट के कारण वह तरीका कारगार साबित नहीं हुआ। बच्चे की निगरानी के लिए कैमरा डाला गया था।
’हुक’ टेक्निक से मिली सफलता इसके बाद NDRF के जवानों ने एक विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया। जवानों के पास एक खास हुकनुमा डिवाइस (जिसे स्थानीय भाषा में ‘अंकुशी’ कहा जाता है) थी, जिसका उपयोग अक्सर मलबे या तंग जगहों में फंसे कपड़ों से फंसाकर खींचने के लिए किया जाता है।
जवानों ने इस डिवाइस को बोरवेल में डाला, जो नीचे जाकर बच्चे के कपड़ों में सुरक्षित रूप से फंस गया। इसके बाद बेहद सावधानी से धीरे-धीरे खींचकर बच्चे को ऊपर लाया गया।
बड़ी मां ने पीयूष से बात की
रेस्क्यू के दौरान पीयूष बेहद डरा हुआ था। NDRF के जवानों ने पहले बच्चे को खुद हाथ पकड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन जब बच्चा डर के मारे कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था, तो उसकी बड़ी मां को बुलाया गया।
उन्होंने बोरवेल के मुंह के पास आकर आवाज लगाई और कहा, “बेटा पकड़ ले बाबू, तुमको बिस्कुट देंगे।” अपनों की आवाज सुनकर बच्चे को हिम्मत मिली, जिसके बाद रेस्क्यू को अंजाम दिया गया।
अंधेरे के कारण रेस्क्यू में परेशानी हुई घटना की खबर जंगल में आग की तरह फैली और देखते ही देखते मौके पर हजारों लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। स्थानीय लोगों ने तुरंत इसकी सूचना पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को दी।
हालांकि, रात का समय होने और चारों तरफ घुप्प अंधेरा छा जाने के कारण रेस्क्यू टीमों को शुरुआती दौर में बचाव कार्य चलाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
बच्चे की बॉडी और घुटने फंस गए थेः NDRF NDRF असिस्टेंट कमांडेंट संतोष ने बताया, रात 7.45 में सूचना मिली कि एक बच्चा बोरवेल में गिर गया है। हमलोग पटना बिहटा से रात 8 बजे निकल गए। 180 किलोमीटर की दूरी तय कर करीब 12 बजे मौके पर पहुंचा। शुरू में बहुत कठिनाई लग रही थी। बच्चे की अपर बॉडी और घुटने इकट्ठे हो गए थे। जिसके वजह से कोई भी हमारा कोई उपकरण नहीं पहुंच पा रहा था। लाइट और ऑक्सीजन सप्लाई पहले से जारी थी, जिससे हमें काफी सुविधा मिली।
300 फीट गहरे बोरवेल में 35 फीट में कैसे फंसा बच्चा? आमतौर पर बोरवेल की बोरिंग करते समय ऊपरी हिस्से का व्यास (Diameter) लगभग 10 इंच का होता है। जैसे-जैसे गहराई बढ़ती है, नीचे की चौड़ाई कम होती जाती है और यह घटकर 6 इंच तक रह जाती है।
बोरवेल का ऊपरी हिस्सा 10 इंच चौड़ा होने के कारण बच्चा उसमें आसानी से नीचे गिर गया। लेकिन नीचे जहां व्यास घटकर 6 इंच रह गया था, वहां बच्चे का शरीर जो कि 6 इंच से थोड़ा चौड़ा था जाकर अटक गया।
इसी वजह से वह और ज्यादा नीचे नहीं गिरा, और 35 फीट पर अटक गया। जिससे उसकी जान बच सकी। इस हादसे का सबसे बड़ा कारण बोरवेल का खुला होना और सुरक्षा में बरती गई लापरवाही रही।
5 में से 4 ऑक्सीजन सिलेंडर खाली इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही भी सामने आई। मौके पर मेडिकल टीम तो मौजूद थी, लेकिन उनकी तैयारी देखकर ग्रामीणों आक्रोशित हो गए।
दरअसल, रेस्क्यू के लिए अस्पताल से 5 ऑक्सीजन सिलेंडर मंगाए गए। जांच की गई तो 4 सिलेंडर बिल्कुल खाली निकले।
इतना ही नहीं, शुरुआत में प्रशासन की ओर से मेडिकल टीम के नाम पर सिर्फ एक नर्स को भेजा गया। उस नर्स को इस तरह के क्रिटिकल रेस्क्यू ऑपरेशन या इमरजेंसी मेडिकल हैंडलिंग का कोई अनुभव नहीं था। बाद में रात करीब 12 बजे डॉक्टरों की एक पूरी मेडिकल टीम मौके पर पहुंची।
वहीं अधिकारी भी लापरवाह नजर आए। स्थानीय लोगों की माने को आपदा प्रबंधन के एडीएम कुमार पंकज को करीब 4 घंटे बाद घटनास्थल पर पहुंचे। तब तक आधा रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म हो चुका था।
बोरवेल के अंदर भी पकड़े रहा मोबाइल
पीयूष जब खेलते-खेलते बोरवेल में गिरा, तो उसके हाथ में मोबाइल फोन था। वह पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान वो मोबाइल हाथ में थामे रहा। जैसे ही उसे सुरक्षित बाहर निकाला जा रहा था, आखिरी पलों में मोबाइल हाथ से छूटकर बोरवेल में गिर गया।
पीयूष का एक पैर फ्रैक्चर हो गया है।
3 साल के पीयूष के पैर में सूजन आ गई थी। बोरवेल से निकालने के तुरंत बाद उसे सीएचसी फतेहपुर भेजा गया। गुरुवार को मगध मेडिकल कालेज में फिर जांच हुई तो उसके पैर में फ्रैक्चर का पता चला। जिसके बाद कच्चा प्लास्टर चढ़ाया गया है। फिलहाल अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है। दस दिनों बाद जांच के लिए फिर बुलाया गया है।
PHED ने एक महीने पहले खोदा था बोरवेल स्थानीय लोगों के मुताबिक, पीएचईडी ने नल-जल योजना के तहत करीब एक महीने पहले यह बोरवेल खुदवाया था। करीब 300 फीट तक इसकी खुदाई की गई थी। लेकिन कम पानी मिलने के कारण इसे शुरू नहीं किया जा सका।
कोई सामान इसमें न गिरे नहीं, इसलिए केवल बोरे से ढंक दिया गया था। हालांकि, बोरवेल खोद कर खुला छोड़ टेने को लेकर गाणीणों में आक्रोश है।
जैसे ही पीयूष बोरवेल में गिरा, विभाग में हड़कंप मच गया। खुद को फंसता देख आनन-फानन में रात ही रात बाकी बोरवेलों को जैसे-तैसे ढंका गया।