दोपहर करीब चार बजे दतिया विधानसभा के आखिरी छोर पर बसे बहादुरपुर गांव में नई बहू के स्वागत में मंगल गीत गूंज रहे हैं। इसी दौरान एक किन्नर महिलाओं के साथ गीत गाता है और हाथ जोड़कर अपील करता है, “इस बार अपनी इस बहन, एक किन्नर को विधायक बनने का मौका देकर देखिए।”
यह संजना सिंह हैं, जो दतिया विधानसभा उपचुनाव में ‘भारतीय गण वार्ता पार्टी’ (भगवा पार्टी) की प्रत्याशी हैं। उनके प्रचार के लिए छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश समेत किन्नर समुदाय के लोग दतिया पहुंचे हैं।
इनमें छत्तीसगढ़ की साध्वी सोम्या दीदी भी शामिल हैं, जिन्होंने अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा से पहले उनकी नजर उतारी थी। सोम्या कहती हैं, “मैं अपनी सखी संजना के प्रचार में शामिल होकर दतिया की नजर उतारने आई हूं।”
संजना कहती हैं कि उनके लिए यह चुनाव केवल हार-जीत का नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय के प्रति समाज की सोच बदलने की लड़ाई है। उनके मुताबिक, नामांकन के दौरान कुछ वकीलों ने उन पर अपमानजनक टिप्पणी की थी। वे कहती हैं, “मैं यह सोच बदलना चाहती हूं कि किन्नर भी इसी समाज का सम्मानित हिस्सा हैं।”
क्या दतिया उपचुनाव के बाद संजना सक्रिय राजनीति में पूरी तरह उतरेंगी? उनका चुनावी अनुभव कैसा रहा और वे किन मुद्दों पर जनता से समर्थन मांग रही हैं? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए ‘भास्कर’ की टीम ने एक दिन उनके साथ बिताया और चुनाव अभियान को करीब से देखा।
बच्चों की नजर उतारी, महिलाओं के साथ गाए मंगल गीत
संजना के चुनाव प्रचार में बड़े नेताओं जैसी कार्यकर्ताओं की भीड़ या गाड़ियों का काफिला नहीं दिखता। वे जिस गली या मोहल्ले में पहुंचने वाली होती हैं, वहां उनकी पार्टी का प्रचार करता ऑटो पहले पहुंच जाता है। ऑटो की आवाज सुनकर लोग उत्सुकता से घरों से बाहर निकल आते हैं।
कुछ देर बाद संजना मुस्कुराते हुए दोनों हाथ जोड़कर लोगों के बीच पहुंचती हैं और समर्थन मांगती हैं। बहादुरपुर गांव में जनसंपर्क के दौरान उन्होंने बच्चों को दुलारते हुए उनकी नजर उतारी।
इसके बाद उन्होंने कहा, “हमें सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहिए। आपने बीजेपी और कांग्रेस, दोनों को मौका दिया है। अब एक बार अपनी इस किन्नर बहन को भी अवसर देकर देखिए। आपकी समस्याओं को कभी अनदेखा नहीं किया जाएगा।”
इसके बाद संजना आगे बढ़ जाती हैं। रास्ते में मंगल गीत गाती महिलाओं को देखकर वे उनके बीच बैठ जाती हैं और तालियां बजाते हुए गीत में शामिल हो जाती हैं। अंत में वे विनम्रता से अपने लिए वोट की अपील करती हैं।
साध्वी सौम्या बोलीं- ‘दतिया की नजर उतारने आई हूं’
संजना के प्रचार में शामिल साध्वी सौम्या दीदी जनता से कहती हैं, ‘आपने वर्षों तक बीजेपी और कांग्रेस को मौका दिया है। इस बार एक किन्नर प्रत्याशी को भी चुनकर देखिए। दतिया की रक्षा के लिए मां पीतांबरा विराजमान हैं, लेकिन किन्नरों की दुआएं भी शुभ मानी जाती हैं।
हमारी सखी संजना सिंह मैदान में हैं, इसलिए दतिया को कभी कोई नजर नहीं लगेगी।’ सौम्या का कहना है कि पुरुषों और महिलाओं की तरह किन्नर समुदाय भी राजनीति की जिम्मेदारी गंभीरता से निभा सकता है।
‘नामांकन के दौरान सुननी पड़ी अपमानजनक टिप्पणी’
प्रचार के दौरान ‘भास्कर’ ने संजना सिंह से उनके राजनीतिक सफर, दतिया से जुड़ाव और स्थानीय मुद्दों पर बातचीत की। राजनीति में आने के सवाल पर संजना ने कहा, “हमारी समस्याओं को हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता। धर्म में प्रतिनिधित्व की जरूरत पड़ी तो हमने अपना शंकराचार्य और अखाड़ा बनाया।
सामाजिक क्षेत्र में भी हमारा समुदाय काम कर रहा है। फिर राजनीति में हमारी भागीदारी क्यों न हो? हम व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। जनता के समर्थन पर संजना कहती हैं, “लोगों का अच्छा सहयोग मिल रहा है। समाज किन्नर समुदाय को पहले से अधिक स्वीकार कर रहा है, हालांकि कुछ लोगों की सोच अभी भी बदलनी बाकी है।
‘दतिया मेरे लिए नया नहीं, हमारे लोग हर जगह हैं’
दतिया को चुनाव के लिए चुनने के सवाल पर संजना ने कहा, ‘कुछ नया और ऐतिहासिक करने के लिए प्रकृति स्वयं रास्ता चुनती है। मां पीतांबरा की यह पावन नगरी प्रमुख शक्तिपीठ है। किन्नर समुदाय का अध्यात्म से गहरा संबंध रहा है, इसलिए मैंने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत यहीं से करने का फैसला किया।’
संजना कहती हैं, ‘किन्नर समाज किसी भौगोलिक सीमा में नहीं बंधा है। हमारे लोग हर शहर में रहते हैं। चुनाव लड़ने के लिए स्थानीय निवासी होना जरूरी नहीं है। दतिया में भी हमारे समुदाय के लोग सामाजिक व मांगलिक आयोजनों में मौजूद रहते हैं। इसलिए यह शहर मेरे लिए नया नहीं है।’
किन मुद्दों पर चुनाव लड़ रही हैं संजना?
संजना का कहना है कि दतिया कई बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। उनके मुताबिक, शहर की सफाई व्यवस्था खराब है और युवाओं के लिए रोजगार व उद्योगों का अभाव है।
मां पीतांबरा की नगरी और प्रमुख शक्तिपीठ होने के बावजूद श्रद्धालुओं व स्थानीय लोगों के लिए जरूरी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। वे आरोप लगाती हैं कि विकास के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव नहीं दिखता।
चुनावी समीकरण: 9 दलों और 10 निर्दलीयों की मौजूदगी
दतिया उपचुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा 19 अन्य उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें 9 प्रत्याशी विभिन्न क्षेत्रीय दलों से और 10 निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि दो बार निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत के अंतर से अधिक वोट मिले, जबकि दो चुनावों में उनका वोट शेयर जीत के अंतर के करीब रहा।
इस बार सपा और बसपा मैदान में नहीं हैं, जिससे निर्दलीयों और छोटे दलों की भूमिका अहम मानी जा रही है।
शबनम मौसी के बाद कोई किन्नर विधानसभा नहीं पहुंच सका
मध्य प्रदेश की राजनीति में किन्नर समुदाय का प्रतिनिधित्व शबनम मौसी से जुड़ा रहा है। वर्ष 1998 में शहडोल जिले की सोहागपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर वे देश की पहली किन्नर विधायक बनी थीं। इसके बाद कई किन्नर उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन कोई भी विधानसभा नहीं पहुंच सका।
2023 विधानसभा चुनाव: शहडोल जिले की जैतपुर सीट से ट्रांसजेंडर प्रत्याशी काजल बाई ने ‘वास्तविक भारत पार्टी’ के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन 667 वोट (0.33% वोट शेयर) मिलने से उनकी जमानत जब्त हो गई।
2018 विधानसभा चुनाव: इस चुनाव में छह किन्नर प्रत्याशी मैदान में थे। इनमें कोतमा से शबनम मौसी, अंबाह से नेहा किन्नर, दमोह से रिहाना सब्बो बुआ, शहडोल से सल्लू मौसी, होशंगाबाद से पांची देशमुख और इंदौर-2 से बाला वैश्वरा शामिल थीं। इनमें चार उम्मीदवार पहली बार चुनाव लड़ रहे थे।