झालावाड़ में पहली बार ड्रैगन फ्रूट की खेती:संतरे के बगीचे में खाली जमीन पर लगाए 400 पौधे, 25 साल तक मिलेंगे फल

झालावाड़ जिले के मिश्रोली निवासी किसान मुकेश पाटीदार ने अपने जेईएन बेटे की सलाह पर खेती-बाड़ी में कृषि वैज्ञानिकों जैसा काम कर दिखाया है। वे बरसों से पारंपरिक फसलों की खेती करते रहे, मगर अब सफल रूप से बागवानी कर रहे हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने तीन बीघा में संतरों के बाग से की थी।

यूट्यूब पर वीडियो देख उगाए ड्रैगन फ्रूट

बेटे राहुल पाटीदार ने अपनी पोस्टिंग के दौरान डीग में ड्रैगन फ्रूट की खेती देखी। फिर पिता को बताया। पिता ने यूट्यूब पर वीडियो देखे। अक्टूबर 2025 में संतरे के पौधों के बीच खाली जमीन में हैदराबाद से मंगवाकर 400 ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगाए। उन्होंने सियाम रेड (टाइप-सी) किस्म के दो साल के पौधे रोपे थे, जो अब तीन वर्ष के हो चुके हैं और सितंबर में फल पक कर तैयार हो जाएंगे।

ऐसे तैयार किए ड्रैगन फ्रूट

उन्होंने बताया कि विदेशी फल ड्रैगन फ्रूट (कमलम) की डिमांड काफी है और यह महंगा भी है। खेती के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है। न ही उपजाऊ मिट्टी की। 45 डिग्री तापमान में भी हो जाता है। जबकि जहां अत्यधिक बारिश होती है, वहां यह खेती सफल नहीं रही। किसान मुकेश ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट लगाने के लिए खेत में आरसीसी पोल लगाए। जिनके ऊपर रिंग लगाकर पौधों की शाखाओं को फैलाया। एक पोल पर चार-चार पौधे लगाए गए हैं। करीब आधा बीघा क्षेत्र में इन पर लगभग 2 लाख रुपए की लागत आई है। सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम है। एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच 8 से 10 फीट की दूरी और एक लाइन से दूसरे लाइन के बीच 18 फीट का अंतर रखा। इसमें सब्जियों के साथ अन्य नकदी फसलें लेते हैं।

एक पौधा देता है 8 से 10 फल

शुरुआती दो तीन वर्षों में एक पौधे से करीब एक किलो फल ही मिलेंगे, लेकिन सात-आठ साल में जब पौधे परिपक्व हो जाएंगे तो एक पौधा 8 से 10 किलो तक फल देगा। बाजार में ड्रैगन फ्रूट का भाव 200 रुपए प्रति किलो या अधिक है। कोटा, जयपुर, इंदौर जैसे शहरों के साथ विदेशों में भी इसकी मांग रहती है। उचित देखभाल पर एक पौधा अगले 20 से 25 वर्ष तक फल देता है। पाटीदार ने बताया कि इसकी सबसे बड़ी बीमारी फंगस लगने की है। इसके लिए वे छाछ, राख के साथ वर्मी कम्पोस्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं। ज्यादा समस्या हो तो रासायनिक कीटनाशक का स्प्रे करते हैं।