बचपन की बीमारी जवान होने तक बरकरार:70 प्रतिशत मरीजों को पता नहीं आगे किस डॉक्टर से कराना चाहिए इलाज, स्वस्थ होने में लग रहा ज्यादा समय

बचपन से न्यूरोलॉजिकल बीमारी का इलाज करा रहे मरीजों के सामने 18 साल की उम्र के आसपास नई परेशानी खड़ी हो जाती है। बीमारी बनी रहती है, लेकिन बच्चों के डॉक्टर से वयस्कों के डॉक्टर के पास जाने की व्यवस्था स्पष्ट नहीं होती। ऐसे में मरीज और उनके परिजन असमंजस में रहते हैं कि आगे इलाज कहां और किससे कराएं। इससे उनका इलाज भी प्रभावित होता है और ठीक होने में समय लगता है।

डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर के एक अध्ययन में यह समस्या सामने आई है। पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष पारख के मार्गदर्शन में डॉ. हुकमसिंह गुर्जर व टीम ने 16 से 25 साल के 50 मरीजों, उनके अभिभावकों और स्वास्थ्यकर्मियों को अध्ययन में शामिल किया। प्रश्नावली और साक्षात्कार से इलाज की अगली व्यवस्था, डॉक्टरों के बीच समन्वय और मरीजों की तैयारी का आकलन किया गया।

मन में डर- नया डॉक्टर पुरानी बीमारी समझेगा या नहीं

स्टडी में 70% मरीजों को पता नहीं था कि आगे किस डॉक्टर या अस्पताल में इलाज कराना है। सिर्फ 56% मरीजों ने अपने डॉक्टर से बच्चों की चिकित्सा सेवाओं से वयस्क सेवाओं में जाने पर चर्चा की थी। महज 8% ने खुद को वयस्क चिकित्सा सेवाओं के लिए पूरी तरह तैयार माना।

मरीजों को चिंता थी कि नए डॉक्टर उनकी पुरानी बीमारी, हिस्ट्री व विशेष जरूरतों को समझ पाएंगे या नहीं। अभिभावकों ने भी डॉक्टरों में समन्वय की कमी, पुराने रिकॉर्ड आगे पहुंचाने व इलाज की योजना समझने में परेशानी बताई।

16 की उम्र से शुरू कर दें तैयारी: डॉ. पारख ने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ मरीज को अपनी बीमारी, दवाओं और जांचों की जानकारी खुद संभालने और इलाज के फैसलों में भाग लेने के लिए तैयार करना जरूरी है। 18 साल की उम्र में अचानक डॉक्टर बदलने के बजाय 16 साल की उम्र से ही ट्रांजिशन की तैयारी शुरू होनी चाहिए।

मिर्गी से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी तक के रोगी हो रहे प्रभावित

पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी में मिर्गी, सेरेब्रल पाल्सी, न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, जन्मजात व आनुवंशिक न्यूरोलॉजिकल बीमारियां, ऑटिज्म से जुड़ी स्थितियां, विकास में देरी, न्यूरोमेटाबॉलिक, मूवमेंट डिसऑर्डर, सिरदर्द और कुछ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां शामिल हैं। इनमें कई मरीजों को किशोरावस्था और वयस्क उम्र तक इलाज की जरूरत रहती है। बीमारी का असर दवाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पढ़ाई, चलने-फिरने, बोलने, रोजगार, सामाजिक जीवन और स्वतंत्रता पर भी पड़ सकता है।