सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री और धार्मिक भेदभाव से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य सामाजिक सुधार या जनहित के नाम पर किसी धार्मिक प्रथा या रिवाज पर रोक लगाता है, तो उसकी जांच कोर्ट कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि हम नहीं तो फिर जांच कौन करेगा?
कोर्ट ने साफ किया कि ज्यूडिशियल रिव्यू की शक्ति पर कुछ सीमाएं हैं, लेकिन यह नहीं कह सकते कि कोर्ट के पास कोई अधिकार ही नहीं है। बेंच ने ये बातें सीनियर वकील जे साई दीपक की दलीलों पर कहीं। वे पंडालम शाही परिवार और ऐतिहासिक श्रीउर मठ की तरफ से कोर्ट में पेश हुए थे।
एडवोकेट दीपक ने कहा:
- कई धार्मिक परंपराएं इतनी पवित्र होती हैं कि कोर्ट को उनमें दखल नहीं देना चाहिए।
- अगर सरकार किसी परंपरा को कानून में लिख दे (कोडिफाई कर दे), तो इसका मतलब यह नहीं कि कोर्ट उसे जांचने लगे।
- कोर्ट का काम सिर्फ यह देखना है कि कानून संविधान के अनुसार है या नहीं, धार्मिक परंपरा सही है या गलत- यह तय करना नहीं।
कोर्ट ने कहा कि संविधान के तहत कोर्ट यह देख सकता है कि सरकार का फैसला सही है या नहीं। पूरी तरह से हाथ खड़े करना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं
इसके पहले कोर्ट ने पूछा, ‘मूर्ति छूना ईश्वर का अपमान कैसे हो सकता है और वे अपवित्र कैसे हो जाते हैं।’ सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, ‘क्या संविधान उस भक्त की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, जिसे केवल उसके वंश और जन्म के कारण देवता को छूने से रोक दिया जाता है।’
इस पर सबरीमाला के वकील एडवोकेट वी. गिरी ने कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं। पूजा देवता की विशेषताओं के उलट नहीं हो सकती। भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुरूप तय की गई हैं।
कल आ सकता है फैसला
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं। फैसला कल आने की संभावना है।
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।
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सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।