संत प्रेमानंद महाराज की तबीयत बिगड़ गई है। इसके चलते उन्होंने रात्रि पदयात्रा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी है। इसके अलावा, महाराजजी के एकांतिक दर्शन भी नहीं होंगे।
रविवार रात हजारों की संख्या में भक्त उनके दर्शन के लिए पहुंचे, लेकिन प्रेमानंदजी हर दिन की तरह रात 3 बजे पदयात्रा पर नहीं निकले। उनकी जगह उनके शिष्य पहुंचे।
शिष्यों ने लाउडस्पीकर से अनाउंस कर बताया-
इसके बाद भक्तों को महाराजजी के दर्शन किए बिना मायूस लौटना पड़ा। केली कुंज आश्रम के मुताबिक, महाराजजी को 21 साल से किडनी की समस्या है।
भक्त बोले- राधा से प्रार्थना करते हैं कि महाराजजी जल्द ठीक हों
- बाराबंकी के राजू गुप्ता ने बताया- हमें बताया गया कि महाराज के दर्शन नहीं हो पाएंगे। इसकी वजह स्वास्थ्य कारण बताया। हम लोग राधा-रानी से प्रार्थना करते हैं कि उनका स्वास्थ्य जल्द ठीक हो, ताकि हम फिर से दर्शन कर पाएं।
- पुष्पा गुप्ता ने बताया- मैं परिवार के साथ आई हूं, लेकिन महराजजी के दर्शन नहीं हो पाए। अब कब तक दर्शन करने का मौका मिलेगा, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई।
- कृति गुप्ता ने बताया- मेरी प्रार्थना है कि जल्द से जल्द वह ठीक हैं, जिससे हम लोग फिर से दर्शन कर सकें।
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डेढ़ किमी पैदल चलकर जाते हैं महाराज संत प्रेमानंद महाराज इन दिनों रात 3 बजे केली कुंज आश्रम से सौभरी वन के लिए निकलते हैं। डेढ़ किमी पैदल चलकर जाते हैं। प्रेमानंद महाराज के दर्शन के लिए रात को हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। आम दिनों में यह संख्या करीब 20 हजार के करीब होती है। वीकेंड पर दर्शन करने वाले भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है और लाखों में पहुंच जाती है। वहीं, बड़े पर्वों पर 3 लाख से ज्यादा हो जाती है।
अब संत प्रेमानंद महाराज की कहानी
13 साल की उम्र में घर छोड़ा प्रेमानंद महाराज का जन्म यूपी में कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में हुआ था। पिता शंभू नारायण पांडे और मां रामा देवी हैं। 3 भाई हैं, प्रेमानंद मंझले हैं। बचपन में प्रेमानंद जी का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। वह बचपन से ही आध्यात्मिक रहे। कक्षा 8 तक पढ़ाई की है।
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बचपन में अनिरुद्ध ने अपनी सखा टोली के साथ शिव मंदिर के लिए एक चबूतरा बनाना चाहा। इसका निर्माण भी शुरू करवाया, लेकिन कुछ लोगों ने रोक दिया। इससे वह मायूस हो गए। उनका मन इस कदर टूटा कि घर छोड़ने का फैसला कर लिया। वह कानपुर होते हुए काशी पहुंचे
जब 13 साल के हुए तो उन्होंने ब्रह्मचारी बनने का फैसला किया। शुरुआत में प्रेमानंद महाराज का नाम ‘आरयन ब्रह्मचारी’ रखा गया। काशी में उन्होंने करीब 15 महीने बिताए। उन्होंने गुरु गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा ली। फिर वह मथुरा आ गए।
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संन्यासी से राधावल्लभी संत बन गए प्रेमानंद महाराज
प्रेमानंद महाराज वृंदावन पहुंचकर हर रोज बांके बिहारी जी के दर्शन करते। फिर रासलीला रास आई और राधावल्लभ के कार्यक्रमों में जाने लगे। वहां घंटों खड़े रहते।
एक दिन एक संत ने श्री राधारससुधानिधि से एक श्लोक पढ़ा, लेकिन महाराज उसे समझ नहीं पाए। फिर एक दिन वृंदावन की परिक्रमा करते समय एक सखी को एक श्लोक गाते हुए सुना।
- उसे सुनकर महाराज ठिठक गए।श्लोक ऐसा रास आया कि अपना संन्यास धर्म तोड़कर वो उस सखी के पास गए। उससे श्लोक का मतलब पूछा। सखी ने कहा- इसका मतलब समझने के लिए राधावल्लभी होना जरूरी है। इस तरह महाराज राधावल्लभी हो गए।