आज शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन:मां चन्द्रघंटा की होगी पूजा; पटना के बड़ी पटन देवी मंदिर में हुई आरती; 1 किमी लंबी लाइन

शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन आज मंगलवार को आश्विन शुक्ल तृतीया में विशाखा नक्षत्र के साथ प्रीति योग, सिद्ध योग और रवियोग के सुयोग में देवी के तीसरे स्वरूप में माता चंद्रघंटा की पूजा होगी।

पटना सिटी के बड़ी पटन देवी मंदिर में सुबह ही पूजा के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ी है। श्रद्धालु आरती में शामिल हुए। मंदिर परिसर से करीब 1 किलोमीटर लंबी श्रद्धालुओं की लाइन लगी है। श्रद्धालु अपने-अपने हाथों में अक्षत, फूल, माला, नारियल, प्रसाद, चुनरी, अरहुल का फूल लेकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। वहीं, शीतला मंदिर में भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

पटना के बांस घाट मां काली के मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। सुबह आरती के साथ मां की पूजा-अर्चना शुरू हुई।

2 दशकों से अखंड ज्योत जल रही

पटना के फुलवारीशरीफ की बिरला कॉलोनी में स्थित मां दुर्गा मंदिर में पिछले 2 दशकों से अखंड ज्योत दीप जल रही है, जो भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है। नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है।

मंदिर के पुजारी पुन्नी बाबा ने बताया कि 10 फरवरी 2006 को मां दुर्गा की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। तभी से यह मंदिर लोगों की आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। भक्तों का मानना है कि सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं माता रानी पूरी करती हैं।

पुजारी अमलेश उपाध्याय के अनुसार, 2006 में जलाई गई अखंड ज्योति आज तक लगातार जल रही है। श्रद्धालु इसे माता की कृपा और भक्ति का प्रतीक मानते हैं। मंदिर आने वाले भक्त अखंड ज्योति के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

‘मां चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है’

आचार्य राकेश झा ने बताया कि शारदीय नवरात्रि के तृतीया तिथि को माता चंद्रघंटा की उपासना होती है। मां चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है। मां को सुगंध अति प्रिय है। उनका वाहन सिंह है। उनके दस हाथ हैं। हर हाथ में अलग-अलग शस्त्र हैं।

वे आसुरी शक्तियों से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। देवी चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है। सौभाग्य, शांति और वैभव की प्राप्ति होती है।

ऐसा होता है देवी चन्द्रघंटा का स्वरूप

ज्योतिषी झा के मुताबिक माता दुर्गा के तीसरे स्वरूप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा गया है। चंद्रघंटा देवी का स्वरूप सोने के समान कांतिवान है। देवी मां की दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में खड्ग, बाण है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है।

देवी की पूजन से कांति-गुण में होगी वृद्धि

ज्योतिषी झा के अनुसार माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना से देवी अपने भक्तों के सभी पाप हर लेती हैं और उसके काम के बीच आने वाली बाधाओं को नष्ट करती हैं। मां चंद्रघंटा सिंह पर सवार हैं, इसलिए इनकी पूजा करने वाला पराक्रमी और निर्भय हो जाता है।

मां चंद्रघंटा के माथे पर अर्धचंद्र सुशोभित है इसलिए इनकी आराधना से स्वभाव में विनम्रता तो आती ही है साथ ही मुख, नेत्र और संपूर्ण काया में कांति-गुण में वृद्धि होती है। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।

उपासना से भूलोक और परलोक में देवी करेंगी कल्याण

पंडित झा ने कहा कि भगवती चंद्रघंटा की उपासना करने से उपासक को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है और जो श्रद्धालु आज के इस दिन श्रद्धा-भक्ति पूर्वक दुर्गा सप्तसती का पाठ करता है, वह संसार में यश, कीर्ति और सम्मान को प्राप्त करता है।

माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना भक्तों को सभी जन्मों के कष्टों और पापों से मुक्त कर भूलोक और परलोक में कल्याण करती है। भगवती अपने दोनों हाथों से साधकों को चिरायु, सुख-संपदा और रोगों से मुक्त होने का वरदान भी देती हैं।

माता चन्द्रघंटा का मंत्र

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्र कैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।