राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं विज्ञान, कॉमर्स और आट्र्स का रिजल्ट जारी होते ही जयपुर जिले के होनहारों के कई किस्से सामने आए हैं। किसी ने पैसे उधार लेकर बेटी को पढ़ाया तो किसी स्टूडेंट ने स्कॉलरशिप के पैसों से पढ़ाई की। स्टूडेंट्स ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद कड़ी मेहनत कर 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए हैं।
जयपुर में ऑटो ड्राइवर के बेटे ने 12वीं मैथ्स-साइंस में 97.80% अंक हासिल किए हैं, वहीं मजदूर की बेटी ने साइंस में 96.20% अंक हासिल किए। साइंस की छात्रा ने स्कॉलरशीप के पसैसों से पढ़कर 96.20% अंक हासिंल किए हैं तो दूसरी ओर दो जुड़वां भाइयों की आर्ट्स में 97% और 96.4% बनी है।
जयपुर के होनहारों की सफलता की ऐसी कई कहानियां हैं जिनसे प्रेरणा भी मिलती है।
कहानी 1- पिता ने उधार लेकर पढ़ाया, बेटी की 99% बनी
मूलत: पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिला निवासी अनूप कुमार दत्ता की छोटी बेटी प्रीति दत्ता, जिनकी 12वीं बोर्ड के कॉमर्स संकाय में 99% बनी है। जयपुर के होनहार के सफलता की कहानी सिर्फ इन तक सीमित नहीं है। बल्कि पिता के समर्पण और त्याग से भी जुड़ी है। जिन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कई बार दोस्तों से पैसे उधार लिए और अपने बच्चों को पढ़ाया।
प्रीति दत्ता माहेश्वरी गर्ल्स स्कूल की छात्रा है
प्रीति ने बताया कि उनकी दसवीं बोर्ड में 95.83% बनी थी। जिसे मैं खुश नहीं थी, क्योंकि मेरे पिता ऑर्टिफिश्यल ज्वेलरी पर पॉलिश का काम करते है। पापा हमारी पढ़ाई के लिए कई बार अपने दोस्तों से उधार लेते। ऐसे में दसवीं के रिजल्ट के बाद ही मैंने तय किया था कि मुझे अपनी पढ़ाई में और सुधार करना है। हालांकि इस बार कॉमर्स में मेरी 99% बनी है लेकिन मुझे और मेहनत करने की जरूरत है, ताकि मैं अपने पिता के सारे सपने सच कर सकूं। प्रीति दत्ता ने बताया कि वह सीए बनना चाहती है।
उन्होंने कहा- इस बार भी परीक्षा में 10th का रिजल्ट मेरे ध्यान में था और मुझे इस बार भी लग रहा था कि मेरी 95% से तो ज्यादा बनेगी। लेकिन 99 तक में पहुंचूंगी इसकी उम्मीद मुझे भी नहीं थी।
उन्होंने कहा कि मैं कभी भी घंटे गिन कर नहीं पढ़ती थी। मेरा जब भी मन होता था मैं पढ़ने के लिए बैठ जाती थी और हर सब्जेक्ट को नियमित टाइम दिया करती थी। पूरे साल स्कूल टाइम में मैंने कभी भी अपनी क्लास को मिस नहीं किया।
छात्रा की मां सोम दत्ता ने बताया कि उनकी बेटी लेट नाइट तक पढ़ाती थी। कई बार रात के 2 से 3:00 बजे तक भी उसके पढ़ने की वजह से उन्हें लाइट बंद करके उसको सोने के लिए कहा करती थी। इसके बावजूद बेटी देर रात तक पढ़ने के बाद भी सुबह स्कूल जाने से पहले नियमित पढ़ाई करती थी।
प्रीति के पिता अनूप कुमार दत्ता ने बताया कि वे सालों पहले रोजगार की तलाश में जयपुर आए थे। तब से जयपुर के ब्रह्मपुरी में रहते हैं। पैशे से ज्वेलरी पॉलिश का काम करते हैं। उनका सपना था कि उनके बच्चे बड़े होकर उनका सपना पूरा करें। लेकिन अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए अपने दोस्तों से उधर तक लिया। ऐसे में बेटी की जब 12th कॉमर्स में 99% लाई है तो दोस्तों से लिया उधार मुझे अब बोझ नहीं लगता।
कहानी 2 – ऑटो ड्राइवर के बच्चों की विज्ञान में 97.80% बनी
जयपुर के दो स्टूडेंट्स युवराज अजवानिया और इशिका साहू की मैथ्स-साइंस में 97.80% बनी है। दोनों के पिता ऑटो चलाकर परिवार का खर्चा चलाते हैं और कठिन परिस्थिति के बाद बच्चों की पढ़ाई पूरी करा रहे हैं।
अचीवर्स अकेडमी सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्रा इशिका साहू ने बताया कि मेरे पिता राजेश साहू एक ऑटो ड्राइवर हैं। परिवार में हम पांच भाई-बहन हैं। जिनमें चार बहनें और एक भाई है। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर मेहनत की।
उन्होंने बताया कि मैंने वो सब महसूस किया है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ती है। उन्होंने कभी हमें ये महसूस नहीं होने दिया कि हम आर्थिक तंगी के चलते अपने सपने पूरा नहीं कर सकें। इसके लिए कई बार वो दिन रात ऑटो चलाते हैं। यहां तक की उनकी कोई रविवार-शनिवार की भी छुट्टी नहीं होती।
उन्होंने कहा- ये अभी सिर्फ पिता के संघर्ष के लिए शुरुआत है, मैं पिता के सपने पूरा करने के लिए IAS अफसर बनकर पूरा करने का प्रयास करूंगी। उन्होंने कहा जब दसवीं बोर्ड में 93.33% बनी थी तो उन्हें निराशा हुई थी, तब लगा था शायद पिता के सपनों को पूरा करने में अभी और मेहनत करनी होगी।
युवराज के पिता भी ऑटो ड्राइवर
युवराज अजवानिया ने अपनी सफलता का श्रेय खासकर अपने पिता को दिया है। उनका कहना है कि उनके पापा ने ऑटो ड्राइवर होने के बावजूद हमारी शिक्षा में कभी कोई कमी नहीं आने दी। उन्होंने कहा- हम मूलत: टोंक के रहने वाले हैं लेकिन हम बच्चों को पढ़ाने के लिए पापा जयपुर आकर रहने लगे। हमारे माता पिता ने हमारी पढ़ाई के लिए कई बहुत संघर्ष किया है। कोरोना में भी जब स्कूल बंद थे, तब पिता ने ऑनलाइन क्लास के लिए उस कठिन समय में हमें पढ़ाई के लिए फोन लाकर दिया।
उन्होंने कहा कि पिता के सपनों को पूरा करने के लिए वे प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा- जब वे सड़क पर ऑटो लेकर गुजरते हैं तो उनकी नजर हर बार सरकारी गाड़ी में बैठे अधिकारी पर होती है। वे चाहते हैं कि हम भी उनकी तरह सरकारी गाड़ी में बैठे दिखें।
कहानी 3 – स्कॉलरशिप से पढ़ाई कर 12वीं में 96.20% हासिल की
बिहार स्थित मोहल्लापुर जिला कटिहार निवासी लता शाह ने 12वीं साइंस-मैथ्स में 96.20% अंक हासिल किए हैं। लता शाह ने स्कॉलरशिप लेकर अपनी पढ़ाई पूरी की है। स्कूल से उन्हें स्कॉलरशीप दसवीं बोर्ड में अच्छे नंबरों की बदौलत मिली थी, जिसके चलते उनकी कक्षा 11वीं और 12वीं की स्कूल फीस संस्थान प्रबंधन ने माफ कर दी थी।
उन्होंने बताया कि उनके पिता जयपुर में मजदूरी करके उन्हें पढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरे पिता कैटरिंग का काम करते हैं। लेकिन कभी भी हम दो बहन-भाइयों की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी। मुझे दसवीं परीक्षा की परीक्षा में अच्छे नंबर लाने की वजह से कक्षा 11 और 12 में स्कूल की ओर से स्कॉलरशिप दी गई थी, जिससे मैं अपनी पढ़ाई सुचारू रख पाई।
उन्होंने कहा मैं जवाहर नगर स्थित सरस्वती बालिका उच्च माध्यमिक विद्या मंदिर की छात्रा हूं।
लता शाह ने बताया कि वह भविष्य में इंजीनियर बनना चाहती है। उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी भी कोई ट्यूशन नहीं की। और ना ही स्कूल डेज में उन्होंने कभी स्कूल मिस किया।
उन्होंने कहा कि मैं कभी भी घंटे या टाइम मैनेजमेंट के हिसाब से नहीं पढ़ती थी, बल्कि सब्जेक्ट वाइज टारगेट तय किया करती थी। हर सप्ताह में सब्जेक्ट का स्कूल के अलावा सेल्फ टेस्ट भी लिया करती थी, जिसकी बदौलत मेरी अच्छी प्रैक्टिस हो जाती थी।
लता शाह ने बताया कि परीक्षा में सबसे ज्यादा हिंदी विषय में डर लगता था। हालांकि हिंदी में भी लता को 92 नंबर मिले। उनका मानना है कि हिंदी को समझना लिखना सबसे जरूरी है। उनका कहना है कि मेहनत करो सब कुछ मिलता है। लता शाह आईआईटी में प्रवेश का सपना रखती है।
जुड़वा भाइयों की कॉमर्स में बनी 97% और 96.4%
जयपुर के दो जुड़वां भाईयों ने माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं कॉमर्स संकाय में करीब-करीब एक जैसे नंबर लाए। आयुष अग्रवाल की 97% और उनके भाई पीयूष अग्रवाल की 96.40% बनी है। वे किस्टल कॉन्वेट स्कूल के छात्र हैं।
दोनों भाई आज भी हाइट और चेहरा काकी मिलता-जुलता है, लेकिन 12वीं बोर्ड कॉमर्स के रिजल्ट में थोड़ा अंतर रहा। आयुष अग्रवाल की 97% और उनके भाई पियूष अग्रवाल की 96.40% बनी। हिंदी विषय की वजह से दोनों भाइयों के रिजल्ट में कुछ पॉइंट्स का अंतर रहा।
गौरतलब है कि आयुष और पीयूष का जन्म 14 जून 2008 में हुआ था। दोनों के जन्म में 2 से 4 मिनट का अंतर है। पहले पीयूष अग्रवाल का जन्म हुआ था और उसके बाद आयुष का जन्म हुआ था। पीयूष और आयुष बचपन से ही एक ही स्कूल में पढ़ रहे हैं। आयुष ने बताया कि उनके परिवार वाणिज्य फील्ड से हैं तो दोनों भाइयों की रूची शुरू से ही कॉमर्स बैकग्राउंड में रही। जिसके चलते दसवीं के बाद दोनों भाइयों ने कॉमर्स विषय का चयन किया।
पीयूष ने बताया कि अब तक दोनों भाइयों के रिजल्ट में कभी भी ज्यादा बड़ा अंतर नहीं रहा। उन्होंने बताया कि हम दोनों भाइयों की दसवीं बोर्ड में पीयूष की 97.17% बनी थी, जबकि आयुष की 97% बनी थी। दोनों ही भाई सीए बनना चाहते हैं। दोनों भाइयों को शतरंज खेलना पसंद है।
पीयूष ने बताया कि हम दोनों भाई शतरंज में एक दूसरे को बराबर टक्कर देते हैं। लेकिन मैं अपने भाई पर इस गेम में भारी पड़ता हूं। हमें उम्मीद है कि हम दोनों भाई सीए बनकर पेरेंट्स की कसौटी पर खड़ा उतरना चाहते है।