हैदराबाद बेस्ड स्काईरूट एयरोस्पेस ने 60 मिलियन डॉलर यानी करीब ₹500 करोड़ की फंडिंग जुटाई है। इस निवेश के बाद कंपनी की वैल्यूएशन 1.1 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹10 हजार करोड़ पहुंच गई है। यह यूनिकॉर्न क्लब में शामिल होने वाला देश का पहला स्पेस स्टार्टअप है।
मैन्युफैक्चरिंग और विक्रम-2 रॉकेट का डेवलपमेंट तेज होगा
CEO पवन कुमार चंदाना ने बताया कि फंडिंग का इस्तेमाल तीन कामों के लिए होगा।
- पहला, विक्रम-1 के नियमित लॉन्च की व्यवस्था करना। यानी हर कुछ महीनों में एक रॉकेट लॉन्च हो सके, ग्राहकों के सैटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़कर कंपनी का रेवेन्यू फ्लो शुरू हो।
- दूसरा, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना ताकि एक साथ कई रॉकेट बना सके। बड़े पैमाने पर उत्पादन से रॉकेट की लागत कम होगी और स्काईरूट दूसरी कंपनियों को टक्कर दे पाएगी।
- तीसरा, विक्रम-2 रॉकेट विकसित करना। ये यह रॉकेट अंतरिक्ष में 1,000 किलो तक का वजन ले जाने में सक्षम होगा। इसमें एडवांस क्रायोजेनिक स्टेज का इस्तेमाल किया जाएगा।
श्रीहरिकोटा भेजे गए विक्रम-1 के जरूरी हिस्से, जल्द होगी लॉन्चिंग
यह फंडिंग ऐसे समय में आई है जब कंपनी अपने पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ की पहली उड़ान की तैयारी कर रही है। स्काईरूट ने हाल ही में हैदराबाद स्थित अपनी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी से रॉकेट के महत्वपूर्ण हिस्सों को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा भेज दिया है।
कंपनी अगले कुछ हफ्तों में इसकी लॉन्चिंग की योजना बना रही है। स्टार्टअप का दावा है कि सैटेलाइट्स को उनकी कक्षा में भेजने के लिए उनकी सेवाएं दुनिया में सबसे सस्ती होंगी।
गूगल के शुरुआती निवेशक राम श्रीराम बोर्ड में शामिल होंगे
इस फंडिंग राउंड का नेतृत्व ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर शेरपालो वेंचर्स और GIC ने किया है। इसमें ग्रीनको ग्रुप के फाउंडर्स और अर्काम वेंचर्स जैसे मौजूदा निवेशकों ने भी हिस्सा लिया।
गूगल के शुरुआती निवेशक राम श्रीराम अब स्काईरूट के बोर्ड में शामिल होंगे। इनके अलावा ब्लैकरॉक, प्लेबुक पार्टनर्स और सांघवी फैमिली ऑफिस ने भी निवेश किया है।
2022 में विक्रम-S से की थी शुरुआत
स्काईरूट ने 2022 में विक्रम-S लॉन्च करके इतिहास रचा था। यह भारत का पहला निजी तौर पर बनाया गया रॉकेट था। विक्रम-1 इसी यात्रा का अगला पड़ाव है, जो पूरी तरह ऑर्बिट तक जा सकेगा।
नॉलेज पार्ट :
- यूनिकॉर्न का मतलब: जब किसी स्टार्टअप की मार्केट वैल्यूएशन 1 बिलियन डॉलर यानी करीब 9,400 करोड़ रुपए को पार कर जाती है, तो उसे ‘यूनिकॉर्न’ कहा जाता है।
- स्काईरूट की शुरुआत: पवन कुमार चंदना ने IIT खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद ISRO में 6 साल काम किया। यहां चंदना की मुलाकात एक अन्य IITian नागा भरत डाका से हुई। दोनों ने नौकरी छोड़कर 2018 में स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत की।