3 बच्चा चोर 72 घंटे की रिमांड पर:नालंदा, बिहारशरीफ समेत 6 जगहों पर छापेमारी, रंग-डिमांड के आधार पर वारदात को देते थे अंजाम

पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर 10 से एक 6 महीने के मासूम को अज्ञात चोर ने 23 अगस्त को चोरी कर लिया था। बच्चे की पहचान आर्यन उर्फ देवांश राज के तौर पर हुई थी। बच्चा अपनी मां के साथ कोटा पटना ट्रेन एक्सप्रेस के जनरल बोगी में सफर कर रहा था। इसी बीच एक अज्ञात शख्स ने बच्चे को खेलाने के बहाने नजदीकी बढ़ानी शुरू की।

पटना जंक्शन पर जब गाड़ी खड़ी हुई तो बच्चे की मां ने विश्वास में आकर उस शख्स के हवाले आर्यन को कर दिया और वॉशरूम चली गई। जब वापस आई, तो बच्चा और वह अज्ञात शख्स दोनों गायब थे। इसके बाद बच्चे की मां रेणु कुमारी ने GRP थाने में शिकायत दर्ज कराई।

रेल पुलिस की कोशिश से बच्चा सकुशल नालंदा से बरामद कर लिया गया। बच्चे के साथ एक और मासूम की बरामदगी हुई और एक बड़े गिरोह के बारे में भी पता चला। जो राज्य के अंदर और दूसरे राज्य में बच्चा चोरी कर के 2 लाख और उससे भी अधिक रुपए में बेचता था।

8 को गिरफ्तार किया गया

इस मामले में मुख्य सरगना मुन्ना बिंद, संतोष उर्फ श्रवण, संजीत समेत 8 को गिरफ्तार किया गया था। इसमें महिला भी शामिल थीं। 72 घंटे की रिमांड पर 3 आरोपी- GRP ने मुन्ना बिंद, संतोष उर्फ श्रवण, संजीत को 72 घंटे की रिमांड पर लेकर पूछताछ की है।

इनकी निशानदेही पर नालंदा, बिहारशरीफ, नवादा समेत 6 से अधिक जगहों पर छापेमारी की गई है। इस दौरान पुलिस को नेटवर्क के बारे में अहम सुराग मिले हैं। तीनों आरोपियों ने GRP के सामने और भी बहुत राज उगले हैं। जिसकी जांच पड़ताल जारी है।

इनकी निशानदेही पर और मासूमों की बरामदगी होने की संभवना है।

रंग और डिमांड के मुताबिक बच्चे की चोरी

तीनों आरोपियों ने पूछताछ में बताया है कि लोगों के अनुसार मिली डिमांड और रंग, चेहरा मोहरा के मुताबिक बच्चे की चोरी करते थे। इसके लिए सार्वजनिक जगहों, राज्य से बाहर बच्चों की रेकी करते रहते थे। जैसे डिमांड के मुताबिक बच्चों पर इनकी नजर पड़ती थी, उसके परिजनों से नजदीकी बढ़ाने लगते थे। उसके आसपास किसी ना किसी बहाने भटकते रहते थे।

पहले झांसे में लेने की कोशिश करते थे। जब बात नहीं बनती थी, तो मौके का फायदा उठाकर फरार हो जाते थे। इसके लिए जिन लोगों की ओर से बच्चे की डिमांड की जाती थी, उनसे एडवांस के तौर पर पहले ही कुछ रुपए ले लेते थे। फिर काम पूरा करने के बाद पूरे रुपए लेते थे।

बच्चा चोरी करने के बाद सीधे अपने ग्राहकों को नहीं देते थे। गिरोह की महिलाएं बच्चों को अपने पास रखती थी। जब किसी तरह की कोई पुलिसिया कार्रवाई नहीं दिखती थी, तो जिन लोगों के लिए बच्चे चोरी कर के लाते थे, उन्हें सौंप देते थे।