2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार द्वारा ग्रुप C और ग्रुप D कर्मचारियों को नियमित (पक्का) करने के लिए बनाई गई नीति को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना रहा है। यह मामला पिछले करीब सात वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था और 4 नवंबर 2025 को कोर्ट ने इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
दरअसल, 2014 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद हुड्डा सरकार ने एक विशेष पॉलिसी बनाकर विभिन्न विभागों में कार्यरत ग्रुप C और ग्रुप D के अस्थायी कर्मचारियों को नियमित करने का निर्णय लिया था। इस नीति के तहत लगभग 4600 कर्मचारियों को सरकारी सेवा में पक्का कर दिया गया था। हालांकि इस फैसले का कई स्तरों पर विरोध हुआ।
आरोप लगाया गया कि नियमितीकरण की प्रक्रिया में नियमों और पारदर्शिता का पालन नहीं किया गया तथा पात्रता और भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार किया गया। इसके बाद इस नीति के खिलाफ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई।
2018 में हाईकोर्ट ने पॉलिसी की रद्द
साल 2018 में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने सुनवाई के बाद हुड्डा सरकार द्वारा बनाई गई नियमितीकरण की सभी पॉलिसियों को निरस्त (रद्द) कर दिया था। अदालत ने कहा था कि सरकारी नौकरियों में नियुक्ति और नियमितीकरण संविधान और निर्धारित नियमों के अनुसार ही होना चाहिए।
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ प्रभावित कर्मचारियों और संबंधित पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा और समय-समय पर इसकी सुनवाई होती रही।
कर्मचारियों और सरकार दोनों की नजर फैसले पर
मामले से जुड़े हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा असर पड़ेगा। यदि हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहता है, तो कर्मचारियों की नौकरी और सेवा शर्तों पर प्रभाव पड़ सकता है। वहीं यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश को पलटता है, तो कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति को वैधता मिल सकती है।
क्यों अहम है यह फैसला
हरियाणा के करीब 4600 कर्मचारियों के भविष्य का सवाल है। सरकारी भर्ती और नियमितीकरण की नीति पर बड़ा कानूनी मार्गदर्शन। भविष्य में ऐसी नीतियों के लिए मिसाल बन सकता है फैसला। आज आने वाला फैसला न केवल प्रभावित कर्मचारियों बल्कि राज्य सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।