पूरी जिंदगी अजेय रहे थे गामा पहलवान, जैविस्को समेत कई विश्‍व विजेताओं को चटाई थी धूल

देश और दुनिया के लिए गामा पहलवान वो इंसान रहा है जो आजीवन अजय रहा और जिसने बड़े से बड़े पहलवान को अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। गामा पहलवान की जन्‍मतिथी को लेकर विवाद है, लेकिन ये तय है कि उनका जन्‍म मई 1878 में पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उन्‍होंने बेहद कम उम्र में ही पहलवानी का ककहरा सीखना शुरू कर दिया था। देसी स्‍टाइल में उन्‍होंने अपने शरीर को इस कदर मजबूत किया कि जिससे पार पाना किसी भी पहलवान के लिए असंभव बन गया।

जिस वक्‍त भारत का बंटवारा हुआ तो गामा पहलवाल का परिवार भी पाकिस्‍तान चला गया था। वहीं पर 1960 में उनका निधन हुआ था। गामा पहलवान का असल नाम गुलाम मुहम्‍मद था। वर्ष 1888 में जब जोधपुर में भारत के 450 नामी पहलवानों को आमंत्रित किया गया था, इनमें से एक गामा भी थे। इस मुकाबले में वो अंतिम 15 में आए थे। जोधपुर के महाराज ने उन्‍हें इस मुकाबले में विजयी घोषित किया था। इसके बाद दतिया के महाराज ने उनका पालन पोषण आरंभ किया। पाकिस्‍तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की दिवंगत पत्‍नी कुलसुम नवाज गामा की ही पोती हैं।

जैविस्‍को से दो बार मुकाबला

गामा पहलवान ने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी और बड़े से बड़े पहलवान को धूल चटाई। इनमें से एक था अमेरिका का जैवि्स्‍को पहलवान। जैविस्‍को पहले भी गामा के हाथों परास्‍त हो चुका था, लेकिन उसको गामा पर विजयी पाने की उम्‍मीद 1928 में दोबारा गामा के सामने ले आई थी। जैविस्‍को ने ही इसकी पहल कर कहा था कि वो गामा का दोबारा सामना करना चाहता था। इन दोनों का आमना-सामना पटियाला में हुआ था। गामा जैविस्‍को के सामने कुछ कमजोर दिखाई दे रहे थे। लेकिन जब मुकाबला शुरू हुआ तो महज दो मिनट में ही गामा ने उसको चारों खाने चित कर दिया। अपनी हार को स्‍वीकारते हुए जैविस्‍को ने गामा की न सिर्फ तारीफ की थी बल्कि उन्‍हें बाघ बताया था, जिसकी गिरफ्त से कोई बच नहीं सकता था। इसके बाद गामा को भारतीय-विश्व स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता का विजयी घोषित किया गया।

हैदराबाद के निजाम का बुलावा

जैविस्‍को को हराने के बाद गामा ने 1929 में जेज पीटरसन को महज डेढ़ मिनट के मुकाबले के बाद धूल चटा दी थी। वर्ष 1940 में गामा पहलवान को हैदराबाद के निजाम ने अपने पहलवानों से मुकाबले के लिए आमंत्रित किया था। वहां पर उन्‍होंने हर किसी को हराकर अपनी जीत का डंका बजाया था। उस वक्‍त उनका मुकाबला बलराम हीरामण सिंह यादव से हुआ था। काफी समय तक चले इस मुकाबले का कोई परिणाम नहीं निकला था। बलराम भी अपने जीवन में किसी मुकाबले में हारा नहीं था। दोनों ही मुकाबले में बराबरी पर रहे। 1952 में गामा ने पहलवानी से सन्‍यास ले लिया था।

सुल्‍तानी को माना था दमदार पहलवान

आपको जानकर हैरानी होगी कि जैविस्‍को को गामा ने कभी एक बड़ा पहलवान नहीं माना था। उन्‍होंने एक बार खुद इसका खुलासा किया था। उनकी निगाह में अपने जीवनकाल में जिस ताकतवर पहलवान ने उन्‍हें कड़ी टक्‍कर दी थी उसका नाम रहीम बख्‍श सुल्‍तानी था। सुल्‍तानी से उनका मुकाबला इलाहाबाद में हुआ था। इन दोनों के बीच कुश्‍ती काफी समय तक चली लेकिन जीत गामा के ही हाथों में लगी थी। इसके बाद गामा को रुस्तम-ए-हिंद का खिताब मिला था। सुल्‍तानी से मुकाबले के साथ ही 1895 में गामा ने अपना करियर भी शुरू किया था। सुल्‍तानी लाहौर के गुजरांवाला का रहने वाला था। उसका कद करीब सात फीट था। उसकी तुलना में गामा की उम्र और कद दोनों ही बेहद कम थे।

गामा जहां उस वक्‍त महज 17 वर्ष के थे वहीं सुल्‍तानी अधेड़ उम्र के थे और करियर की ढलान पर थे। इस मैच में पहले गामा डिफेंसिव रहे लेकिन बाद में सुल्‍तानी के खेल को परखते हुए अटैकिंग हो गए थे। इस मैच में गामा पहलवान के मुंह और नाक से खून आने लगा था, लेकिन उन्‍होंने हार नहीं मानी थी। ये मैच भी बराबरी पर ही रोक दिया गया था। इस मैच से गामा की ख्‍याति काफी बढ़ गई थी। सभी ने गामा की तारीफ की थी।

महज डेढ़ मिनट में जीते

1910 में लंदन में हुए मुकाबले में उन्‍हें ये कहते हुए लड़ने से मना कर दिया गया था कि उनकी लंबाई काफी कम है। इसके बाद उन्‍होंने घोषणा की थी कि वो किसी भी भार वर्ग के तीन पहलवानों को अखाड़े से उठाकर बाहर फेंकने के काबिल हैं। इसके बाद उन्‍होंने इस मुकाबले में शामिल होने वाले फ्रैंक गॉच और स्टैनिस्लॉस जैविस्‍को को सीधी चुनौती दी थी।

उनका कहना था कि या तो वो इस मुकाबले को जीतेंगे या फिर हार कर हमेशा के लिए घर वापस चले जाएंगे। उनकी चुनौती स्‍वीकारते हुए सबसे पहले बेंजामिन ने अखाड़े में उतरना तय किया। लेकिन दस मिनट में ही वो हार गया और अपना सा मुंह लेकर अखाड़े से बाहर हो गया। इसके बाद उनका मुकाबला 12 पहलवानों से हुआ और सभी को हार का सामना करना पड़ा था।

जैविस्‍को से पहला मुकाबला

10 सितंबर 1910 को गामा का पहली बार विश्‍व प्रसिद्ध पहलवान जैविस्‍को मुकाबना हुआ था। इस मुकाबले केा जीतने में गामा को महज डेढ़ मिनका का समय लगा था। निर्धारित हुआ था । ज़ैविस्को को तब विश्वप्रसिद्ध पहलवानों में से एक माना जाता था। ये मुकाबला काफी लंबा था। जैविस्‍को हर बार गिरता लेकिन अंत में खड़ा हो जाता था। हालांकि वो एक भी बार गामा को घुटनों पर नहीं ला सका। लंबे चले मुकाबले के बाद दोनों को ही बराबरी पर रोक‍ दिया गया था। इस तरह से दोनों के ही दिल में एक दूसरे को हराने की कसक बाकी रह गई थी।

नतीजे पर पहुंचने केलिए दोबारा मैच कराने का फैसला किया गया जिसके लिए 17 सितंबर 1910 निर्धारित की गई। लेकिन इसमें जैविस्‍को नहीं आ सका और गामा को बिना लड़े ही विजेता घोषित कर दिया गया था। इसके बाद भी दोनों के बीच एक दूसरे को परास्त करने की कसक बची हुई थी। ये कसक 1928 में पूरी हुई। इसके बाद गामा ने एक के बाद एक विश्‍व के कई पहलवानों को धूल चटाई। इनमें अमेरिका के बेंजामिन रोलर, जॉर्ज हेकेनस्किमित और फ्रैंक गॉच, स्विट्जरलैंड के मॉरिस डेरियस और जॉन लेम, स्वीडन के विश्‍व विजेता खिताब से सम्‍मानित जेस पीटरसन, जापान के टैरो मियाके का नाम शामिल है।